Wednesday, 8 November 2017

नोटबंदी की 101 उपलब्धियां

नोटबंदी की 101 उपलब्धियां :-

01- नोटबंदी के बाद 16.6 खरब नोट सिस्टम में वापस आ गए। 16 हजार करोड़
रुपये को छोड़कर सभी कैश बैंक में जमा हो जाने से बिना हिसाब वाले पैसों
का पता चला।
02- अधिकतर कैश के बैंकिंग सिस्टम आने से इस पैसे को कानूनी दर्जा मिला
और नोटबंदी अवैध धन रखने वालों के खिलाफ एक्शन लेने का एक जरिया बना है।
03- कासा यानी चालू खाता, बचत खाता जमाओं में कम से कम 2.50-3.00 प्रतिशत
की वृद्धि हुई।
04- मुद्रा बाजार की ब्याज दरों में गिरावट हुई और म्युचुअल फंडों के साथ
बीमा क्षेत्र में धन का प्रवाह बढ़ा।
05- आयकर विभाग ने संदिग्ध लेन-देन को लेकर 517 नोटिस जारी किए थे, जिसके
बाद 1833 करोड़ रुपये की 541 संपत्तियां जब्त की गई।
06- नोटबंदी के बाद 17.73 लाख संदिग्‍ध मामलों की पहचान की गई, जिनमें
3.68 लाख करोड़ रुपये की हेरा-फेरी हुई है।
07- आयकर विभाग द्वारा 9 नवंबर 2016 से लेकर मार्च 2017 के बीच चलाए गए
करीब 900 सर्च अभियान में 900 करोड़ रुपये की संपत्ति सीज की गई।
08- नोटबंदी के बाद पता लगा कि 1 लाख 48,165 लोगों ने ही लगभग 4 लाख
92,207 करोड़ रुपये जमा किए। यानी भारत की 0.00011% जनसंख्या ने ही देश
में उपलब्ध कुल कैश का लगभग 33 प्रतिशत जमा किया।
09- नोटबंदी के बाद 961 करोड़ रुपये की ऐसी प्रॉपर्टी का पता चला है
जिसका कभी खुलासा ही नहीं किया गया था।
10- नोटबंदी के बाद तीन लाख से अधिक शेल यानी मुखौटा कंपनियों का पता
लगाया जा सका है, जिनपर कार्रवाई की जा रही है।
11- सरकार ने 2.24 लाख कंपनियों को बंद कर दिया। ये कंपनिया सरकार की
अनुमति के बिना अपने ऐसेट्स को बेच या ट्रांसफर नहीं कर सकती हैं।
12- नोटबंदी के बाद प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना (पीएमजीकेवाई) के तहत
21,000 लोगों ने 4,900 करोड़ रुपये मूल्य के कालेधन की घोषणा की।

13- नोटबंदी के दौरान 35 हजार संदिग्ध फर्जी कंपनियों ने 17 हजार करोड़
डिपॉजिट किए, जो सरकार की नजर में आ गए।
14- बैंकों ने 35 हजार कंपनियों और 58 हजार बैंक खातों की जानकारी वित्त
मंत्रालय को दी, जिसके बाद इन पर एक्शन लिया गया।
15- नोटबंदी के बाद एक कंपनी के 2,134 बैंक खातों के बारे में पता चला।
इन कंपनियों के खातों में 10,200 करोड़ रुपये जमा किए गए थे, जो पकड़े
गए।
16- नोटबंदी के बाद तीन से चार खरब डॉलर के ट्रांजैक्शन्स संदिग्ध लग रहे
हैं, इसके लिए 1.8 लाख नोटिस भेजे गए हैं और इन पर कार्रवाई होने ही वाली
है।
17- नोटबंदी के बाद फर्जी कंपनियों के डायरेक्टर्स का भी पता लगा। इसके
तहत पिछले तीन वित्तीय वर्षों से वित्तीय विवरण न भरने वाले 3.09 लाख
कंपनी बोर्ड डायरेक्टर्स को अयोग्य घोषित कर दिया गया।
18- नोटबंदी के बाद पता लगा कि 3000 डायरेक्टर्स 20 से ज्यादा कंपनियों
के बोर्ड डायरेक्टर थे, जो कानूनी सीमा से ज्यादा है।
19- नोटबंदी के बाद कैश डीलिंग से लोग बच रहे हैं और लेन-देन में
पारदर्शिता आई है।
20- नोटबंदी के बाद तीन लाख करोड़ से अधिक रकम बैंकों में जमा कराई गई।
21- नोटबंदी के बाद 23.22 लाख बैंक खातों में लगभग 3.68 लाख करोड़ रुपये
के संदिग्ध कैश जमा हुए, जिसका पता सरकार को लग गया।
22- 17.73 लाख संदिग्ध पैन कार्ड धारकों का पता चला।
23- बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने 4.7 लाख से अधिक संदिग्ध लेन-देन की
जानकारी इकट्ठा की।
24- जांच, जब्ती और छापों में 29,213 करोड़ रुपये की अघोषित आय का पता चला।
25- नोटबंदी के बाद 813 करोड़ रुपये से अधिक की बेनामी संपत्ति जब्त कर ली गई है।
26– नोटबंदी के बाद 400 से अधिक बेनामी लेन-देन की पहचान हुई और 29 हजार
200 करोड़ से अधिक अघोषित आय का पता चला।
27- नोटबंदी के बाद से सोने की स्मगलिंग में बड़ी गिरावट आई, क्योंकि
मार्केट में कम पूंजी थी और निगरानी सख्त हुई।

28- नोटबंदी के बाद भारत एक लेस कैश सोसाइटी की दिशा में डिजिटल
ट्रांजेक्शन्स 300 प्रतिशत तक बढ़े।
29- कैशलेस लेन-देन लोगों के जीवन को आसान बनाने के साथ-साथ हर लेन-देन
से काले धन को हटाते हुए क्लीन इकोनॉमी बनाने में भी मददगार साबित हुआ
है।
30- चलन में रहने वाली नकदी में भारी गिरावट हुई और कैश 17.77 लाख करोड़
रुपये से कम होकर 4 अगस्त 2017 को 14.75 लाख करोड़ पर आ गया। यानी अब महज
83 प्रतिशत ही प्रभावी नकदी है।
31- लेस कैश व्यवस्था से वस्तु एवं सेवाएं तो सस्ती हुई ही, साथ ही साथ
आवास, शिक्षा, चिकित्सा उपचार आदि की लागत भी कम हुई है।
32– नोटबंदी के बाद डिजिटल लेन-देन काफी तेजी से बढ़ा है। अगस्त 2016 में
87 करोड़ डिजिटल लेन-देन हुए थे, जबकि 2017 में यह संख्या 138 करोड़ हो
गई यानी 58 प्रतिशत की वृद्धि।
33- वर्ष 2017-18 में डिजिटल लेनदेन में 80 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती
है। यह रकम कुल मिलाकर 1800 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।
34- अक्टूबर 2016 में 15.11 लाख की तुलना में अगस्त 2017 में कार्ड उपयोग
वाली पीओएस मशीनों की संख्या बढ़कर 28.82 लाख हो गई।
35- नोटबंदी से पहले भारत में पहले कुल 15.11 लाख पीओएस मशीनें थीं,
लेकिन पिछले 1 वर्ष में 13 लाख से अधिक पीओएस मशीनें जोड़ी गई हैं।
36- पीओएस मशीनों पर डेबिट कार्ड ट्रांजेक्शन्स की संख्या अगस्त 2016 के
13.05 करोड़ से बढ़कर अगस्त 2017 में 26.55 करोड़ हो गई।
37– पीओएस मशीनों पर डेबिट कार्ड के द्वारा अगस्त 2016 में 18,370 करोड़
रुपये के ट्रांजैक्शन्स हुए थे, जबकि अगस्त 2017 में यह 35,413 करोड़
रुपये हो गए।
38- अगस्त 2016 में 26,849 करोड़ रुपये के आईएमपीएस ट्रांजैक्शन्स हुए
थे, जो अगस्त 2017 में बढ़कर 65,149 करोड़ रुपये हो गए।
39- मोबाइल वॉलेट के द्वारा ट्रांजेक्शन्स अगस्त 2016 में 7.07 करोड़ से
3 गुना बढ़कर अगस्त 2017 में 22.54 करोड़ हो गए।
40- मोबाइल वॉलेट के द्वारा अगस्त 2016 में 3,074 करोड़ रुपये के
ट्रांजेक्शन्स हुए थे, जबकि अगस्त 2017 में 7,262 करोड़ रुपये के
ट्रांजेक्शन्स हुए।
41- मोबाइल वॉलेट से लेन-देन की संख्या में हर साल 94 प्रतिशत की बढ़ोतरी
हुई है, जो 2022 तक 126 प्रतिशत सलाना दर से बढ़ते हुए 32,000 अरब रुपये
पर पहुंच जाएगा।
42- नोटबंदी के बाद यूनीफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) और सरकार की तरफ से
लाए गए BHIM मोबाइल ऐप का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ा है। UPI-BHIM से
नवंबर 2016 में 0.1 लाख, अक्टूबर 2017 तक 23.36 लाख रुपये रोजाना लेन-देन
होता है।
43- ई-टोल पेमेंट में बड़ा उछाल। जनवरी 2016 में यह आंकड़ा 88 करोड़ से
बढ़कर अगस्त 2017 में यह आंकड़ा 275 करोड़ रुपये हो गया।
44- नोटबंदी के बाद क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल में भी 40 प्रतिशत से अधिक
की बढ़त हुई है।
45- ऑनलाइन इनकम टैक्स रिटर्न भरने में 2016-17 के लिए इनकम टैक्स रिटर्न
की ई-फाइलिंग में करीब 23 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
46- ई-कॉमर्स के लिए Rupay का इस्तेमाल बढ़ा है। इसके साथ ही ई-कॉमर्स पर
किए जाने वाला खर्च भी दोगुना से अधिक बढ़ा है।

47- नोटबंदी के चलते आतंकवादियों और नक्सलवादियों की कमर टूट गई।
48- पत्थरबाजों को पैसे देने के लिए अलगाववादियों के पास धन की कमी हो गई।
49- पत्थरबाजी की घटनाएं पिछले वर्ष की तुलना में घटकर मात्र एक-चौथाई रह गईं।
50- पत्थरबाजी की घटनाएं (नवंबर 2015 – अक्टूबर 2016) 2683 से घटकर
(नवंबर 2016- जुलाई 2017) महज 639 ही रह गईं।
51- पत्थरबाजी में पहले 500 से 600 लोग होते थे, अब 20-25 की संख्या भी
नहीं होती है।
52- नोटबंदी के बाद नक्सली घटनाओं में 20% से ज्यादा की कमी आई।
53- अक्टूबर 2015 से नवंबर 2016 में 1071 नक्सली घटनाएं हुईं। वहीं 2016
के अक्टूबर से अब तक मात्र 831 रह गई।
54- नोटबंदी के बाद पता लगा कि पांच सौ के हर 10 लाख नोट में औसत 7 और
1000 के हर 10 लाख नोटों में औसत 19 नोट नकली थे।
55- 2016-17 में कुल 762 हजार जाली नोट पकड़े गए।
56- जाली नोट पकड़े जाने में पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 20% की वृद्धि हुई।

नोटबंदी के बाद अलगाववादियों पर शिकंजा के लिए चित्र परिणाम

57- नोटबंदी के बाद टैक्स बेस बढ़ने से टैक्सेशन न्यायसंगत हो रहा है।
58- सरकार गरीबी उन्मूलन और घरों, सड़क, रेलवे, आदि जैसे
इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए और अधिक संसाधनों का इस्तेमाल कर पा
रही है।
59- टैक्सपेयर्स की संख्या में 26.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। 2015-16 में
66.53 लाख थी, जो 2016-17 में बढ़कर 84.21 लाख हो गई।
60- ई-रिटर्न की संख्या में बड़ी वृद्धि हुई है। 2016-17 में 2.35 करोड़
से बढ़कर 2017-18 में 3.01 करोड़ हो गई।
61- नोटबंदी के बाद 4 लाख 73 हजार से अधिक संदिग्ध लेन-देन का पता चला।
62- नोटबंदी के बाद 56 लाख से अधिक नए करदाता जुड़े।
63- पर्सनल इनकम टैक्स के एडवांस्‍ड टैक्स कलेक्शन में पिछले साल के
मुकाबले 41.79 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
64- निजी आयकर का अग्रिम संग्रह पिछले वर्ष की तुलना में 41.79 % बढ़ा।
65- नोटबंदी के बाद पूर्वोत्तर के राज्यों में आयकर संग्रह में रिकॉर्ड
वृद्धि हुई है। वित्त वर्ष 2016-17 में नागालैंड में आयकर संग्रह में
करीब 300 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
66- 04 अगस्त तक लोगों के पास 14,75,400 करोड़ रुपये की करेंसी सर्कुलेशन
में थे। जो वार्षिक आधार पर 1,89,200 करोड़ रुपये की कमी दिखाती है।
67- 6 लाख करोड़ रुपये के हाई वैल्यू नोट्स प्रभावी रूप से कम हुए, जो इस
समय सर्कुलेशन में आए नोटों का 50 प्रतिशत है।
68- नोटबंदी के कारण ‘कैश बब्बल’ यानी नकदी के ढेर से भारत बच गया।
69– नोटबंदी के निर्णय ने भारत को अमेरिका की 2008 जैसी महामंदी से बचाया।
70- चलनिधि यानी Liquidity की कमी से उत्पन्न हुई समस्या से मुक्ति मिली।

71- जीडीपी औसत नकदी में पिछले वर्ष नवंबर से पहले 11.3 प्रतिशत की तुलना
में 9.7 प्रतिशत हो गया है।
72- तीन से चार खरब डॉलर के ट्रांजैक्शन्स संदिग्ध लग रहे हैं, इसके लिए
1.8 लाख नोटिस भेजे गए हैं।
73- नोटबंदी के बाद अधिक से अधिक क्षेत्रों को संगठित किया जाना संभव हुआ।
74- संगठित किए जाने की वजह से गरीबों के लिए नौकरी के ज्यादा अवसर पैदा
हुए। फॉर्मल जॉब्स की संख्या बढ़ी।
75- नौकरियों के संगठित होने से देश ने स्वच्छ अर्थव्यवस्था की तरफ कदम बढ़ाया।
76- नोटबंदी के बाद मजदूरों के सारे अधिकार मिलने लगे हैं, सामाजिक
सुरक्षा से जुड़ी सुविधाएं भी मिलनी शुरू हो गई है।
77- एक करोड़ से अधिक कर्मचारियों का अब EPFO एवं ESIC में नामांकन हो चुका है।
78- सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं दिलाने के लिए 1.3 करोड़
कर्मचारियों को ESIC में पंजीकरण किया गया है।
79- श्रमिकों को अधिकार और सामाजिक सुरक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य
सुविधाएं भी मिलनी शुरू हो गई हैं।
80- नोटबंदी से बिचौलियों का अंत हुआ और श्रमिकों को सीधा भुगतान होने लगा।
81- भुगतान सुनिश्चित करने के लिए वेतन भुगतान कानून (पेमेंट ऑफ वेजेज
एक्ट) में ऐतिहासिक संशोधन किया गया।
82- वेतन सीधे बैंक खाते में डालने के लिए श्रमिकों के 50 लाख नए बैंक
खाते खोले गए।
83- टैक्स कंप्लायंस में भारी वृद्धि हुई जिससे देश की जनकल्याणकारी
योजनाओं पर खर्च करने की क्षमता में बढ़ोतरी हुई।
84- सरकार का राजस्व बढ़ा और जन कल्याण एवं इन्फ्रास्ट्रक्चर पर अधिक से
अधिक खर्च किया जा रहा है।
85- सागरमाला और भारतमाला जैसी परियोजनाओं को नोटबंदी के बाद अधिक धन
मुहैया कराया जा सका है।
86- नोटबंदी के बाद सीमावर्ती क्षेत्रों में सामरिक क्षमताओं के विकास
में तेजी आ पायी है।

87- नोटबंदी के वक्त सेंसेक्स करीब 25 हजार के आस-पास था। अब मुंबई स्टॉक
एक्सचेंज का शेयर सूचकांक करीब 33 हजार के इर्द-गिर्द है।
88- नोटबंदी के वक्त निफ्टी करीब आठ हजार अंकों के करीब थी, जो अब 10,500
के इर्द गिर्द है।
89- नोटबंदी के बाद निवेशकों का भरोसा बढ़ा है और बिकवाली घटी है। यानी
भारतीय अर्थव्यवस्था में एक स्थायित्व का भाव है।

90- नोटबंदी से EMI दरों में कमी से लेकर किफायती आवास तक, वित्तीय
साधनों में बचत बढ़ने से लेकर शहरी निकायों के राजस्व में वृद्धि हुई।
91– ऋण दरों में लगभग 100 बेसिस पॉइंट्स की गिरावट आई है।
92- ऋण चुकाने पर लगने वाला ब्याज घटा है और EMI कम हुई है।
93- नोटबंदी के बाद रियल एस्टेट की कीमतें घटी। प्रधानमंत्री आवास योजना
के तहत ब्याज पर छूट मिली और रेट-कटस् के परिणामस्वरूप EMI भी घटी।
94– नोटबंदी के बाद देश भर के शहरी स्थानीय निकायों का राजस्व लगभग 3 गुना बढ़ा है।
95- उत्तर प्रदेश में शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) के राजस्व में 4
गुना वृद्धि हुई है।
96- मध्य प्रदेश और गुजरात के शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) के राजस्व
में लगभग 5 गुना वृद्धि हुई है।
97- लोगों की कुल वित्तीय बचत यानी ग्रॉस फाइनेंसियल सेविंग्स जो 5
वर्षों से GNDI के लगभग 10% पर अटकी हुई थी, नोटबंदी के बाद 11.8% तक
पहुंच गई है।
98- 2016-17 में GNDI के डिपॉजिट्स, शेयर एंड डिबेंचर्स, बीमा फंड एवं
पेंशन और प्रोविडेंट फंड की कुल वित्तीय बचत 9% से बढ़कर 13.3% हो गई।
99– विकसित अर्थव्यवस्थाओं के हिसाब से ये पॉजिटिव ट्रेंड है, जिनमें
फाइनेंसियल एसेट्स में निवेश का हिस्सा ज्यादा है।
100- नोटबंदी के बाद लोगों के निवेश रेगुलेटेड मार्केट में आ रहे हैं,
जहां स्थिरता भी है और अच्छे रिटर्न की गारंटी भी है।
101– ऐसे एसेट्स जिनका प्रबंधन म्यूचुअल फंड द्वारा किया जाता है, वे
सितंबर 2017 के अंत तक 20.4 ट्रिलियन पर पहुंच गए हैं, जो अब तक का
उच्चतम स्तर है।

Saturday, 21 October 2017

अष्टावक्र

अष्टावक्र
अद्वैत वेदान्त के महत्वपूर्ण ग्रन्थ अष्टावक्र गीता के ऋषि हैं। अष्टावक्र गीता #अद्वैत_वेदान्त का महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। 'अष्टावक्र' का अर्थ 'आठ जगह से टेढा' होता है। कहते हैं कि अष्तावक्र का शरीर आठ स्थानों से टेढा था।
#उद्दालक ऋषि के पुत्र का नाम श्‍वेतकेतु था। उद्दालक ऋषि के एक शिष्य का नाम #कहोड़ था। कहोड़ को सम्पूर्ण वेदों का ज्ञान देने के पश्‍चात् उद्दालक ऋषि ने उसके साथ अपनी रूपवती एवं गुणवती कन्या #सुजाता का विवाह कर दिया। कुछ दिनों के बाद सुजाता गर्भवती हो गई। एक दिन कहोड़ वेदपाठ कर रहे थे तो गर्भ के भीतर से बालक ने कहा कि पिताजी! आप वेद का गलत पाठ कर रहे हैं। यह सुनते ही कहोड़ क्रोधित होकर बोले कि तू गर्भ से ही मेरा अपमान कर रहा है इसलिये तू आठ स्थानों से वक्र (टेढ़ा) हो जायेगा।

हठात् एक दिन कहोड़ राजा #जनक के दरबार में जा पहुँचे। वहाँ बंदी से शास्त्रार्थ में उनकी हार हो गई। हार हो जाने के फलस्वरूप उन्हें जल में डुबा दिया गया। इस घटना के बाद अष्टावक्र का जन्म हुआ। पिता के न होने के कारण वह अपने नाना उद्दालक को अपना पिता और अपने मामा श्‍वेतकेतु को अपना भाई समझता था। एक दिन जब वह उद्दालक की गोद में बैठा था तो श्‍वेतकेतु ने उसे अपने पिता की गोद से खींचते हुये कहा कि हट जा तू यहाँ से, यह तेरे पिता का गोद नहीं है। अष्टावक्र को यह बात अच्छी नहीं लगी और उन्होंने तत्काल अपनी माता के पास आकर अपने पिता के विषय में पूछताछ की। माता ने अष्टावक्र को सारी बातें सच-सच बता दीं।

अपनी माता की बातें सुनने के पश्‍चात् अष्टावक्र अपने मामा श्‍वेतकेतु के साथ बंदी से शास्त्रार्थ करने के लिये राजा जनक के यज्ञशाला में पहुँचे। वहाँ द्वारपालों ने उन्हें रोकते हुये कहा कि यज्ञशाला में बच्चों को जाने की आज्ञा नहीं है। इस पर अष्टावक्र बोले कि अरे द्वारपाल! केवल बाल सफेद हो जाने या अवस्था अधिक हो जाने से कोई बड़ा आदमी नहीं बन जाता। जिसे वेदों का ज्ञान हो और जो बुद्धि में तेज हो वही वास्तव में बड़ा होता है। इतना कहकर वे राजा जनक की सभा में जा पहुँचे और बंदी को शास्त्रार्थ के लिये ललकारा।

राजा जनक ने अष्टावक्र की परीक्षा लेने के लिये पूछा कि वह पुरुष कौन है जो तीस अवयव, बारह अंश, चौबीस पर्व और तीन सौ साठ अक्षरों वाली वस्तु का ज्ञानी है? राजा जनक के प्रश्‍न को सुनते ही अष्टावक्र बोले कि राजन्! चौबीस पक्षों वाला, छः ऋतुओं वाला, बारह महीनों वाला तथा तीन सौ साठ दिनों वाला संवत्सर आपकी रक्षा करे। अष्टावक्र का सही उत्तर सुनकर राजा जनक ने फिर प्रश्‍न किया कि वह कौन है जो सुप्तावस्था में भी अपनी आँख बन्द नहीं रखता? जन्म लेने के उपरान्त भी चलने में कौन असमर्थ रहता है? कौन हृदय विहीन है? और शीघ्रता से बढ़ने वाला कौन है? अष्टावक्र ने उत्तर दिया कि हे जनक! सुप्तावस्था में मछली अपनी आँखें बन्द नहीं रखती। जन्म लेने के उपरान्त भी अंडा चल नहीं सकता। पत्थर हृदयहीन होता है और वेग से बढ़ने वाली नदी होती है।

अष्टावक्र के उत्तरों को सुकर राजा जनक प्रसन्न हो गये और उन्हें बंदी के साथ शास्त्रार्थ की अनुमति प्रदान कर दी। बंदी ने अष्टावक्र से कहा कि एक सूर्य सारे संसार को प्रकाशित करता है, देवराज इन्द्र एक ही वीर हैं तथा यमराज भी एक है। अष्टावक्र बोले कि इन्द्र और अग्निदेव दो देवता हैं। नारद तथा पर्वत दो देवर्षि हैं, अश्‍वनीकुमार भी दो ही हैं। रथ के दो पहिये होते हैं और पति-पत्नी दो सहचर होते हैं। बंदी ने कहा कि संसार तीन प्रकार से जन्म धारण करता है। कर्मों का प्रतिपादन तीन वेद करते हैं। तीनों काल में यज्ञ होता हे तथा तीन लोक और तीन ज्योतियाँ हैं। अष्टावक्र बोले कि आश्रम चार हैं, वर्ण चार हैं, दिशायें चार हैं और ओंकार, आकार, उकार तथा मकार ये वाणी के प्रकार भी चार हैं। बंदी ने कहा कि यज्ञ पाँच प्रकार के होते हैं, यज्ञ की अग्नि पाँच हैं, ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं, पंच दिशाओं की अप्सरायें पाँच हैं, पवित्र नदियाँ पाँच हैं तथा पंक्‍ति छंद में पाँच पद होते हैं। अष्टावक्र बोले कि दक्षिणा में छः गौएँ देना उत्तम है, ऋतुएँ छः होती हैं, मन सहित इन्द्रयाँ छः हैं, कृतिकाएँ छः होती हैं और साधस्क भी छः ही होते हैं। बंदी ने कहा कि पालतू पशु सात उत्तम होते हैं और वन्य पशु भी सात ही, सात उत्तम छंद हैं, सप्तर्षि सात हैं और वीणा में तार भी सात ही होते हैं। अष्टावक्र बोले कि आठ वसु हैं तथा यज्ञ के स्तम्भक कोण भी आठ होते हैं। बंदी ने कहा कि पितृ यज्ञ में समिधा नौ छोड़ी जाती है, प्रकृति नौ प्रकार की होती है तथा वृहती छंद में अक्षर भी नौ ही होते हैं। अष्टावक्र बोले कि दिशाएँ दस हैं, तत्वज्ञ दस होते हैं, बच्चा दस माह में होता है और दहाई में भी दस ही होता है। बंदी ने कहा कि ग्यारह रुद्र हैं, यज्ञ में ग्यारह स्तम्भ होते हैं और पशुओं की ग्यारह इन्द्रियाँ होती हैं। अष्टावक्र बोले कि बारह आदित्य होते हैं बारह दिन का प्रकृति यज्ञ होता है, जगती छंद में बारह अक्षर होते हैं और वर्ष भी बारह मास का ही होता है। बंदी ने कहा कि त्रयोदशी उत्तम होती है, पृथ्वी पर तेरह द्वीप हैं।...... इतना कहते कहते बंदी श्‍लोक की अगली पंक्ति भूल गये और चुप हो गये। इस पर अष्टावक्र ने श्‍लोक को पूरा करते हुये कहा कि वेदों में तेरह अक्षर वाले छंद अति छंद कहलाते हैं और अग्नि, वायु तथा सूर्य तीनों तेरह दिन वाले यज्ञ में व्याप्त होते हैं।

इस प्रकार शास्त्रार्थ में बंदी की हार हो जाने पर अष्टावक्र ने कहा कि राजन्! यह हार गया है, अतएव इसे भी जल में डुबो दिया जाये। तब बंदी बोला कि हे महाराज! मैं वरुण का पुत्र हूँ और मैंने सारे हारे हुये ब्राह्मणों को अपने पिता के पास भेज दिया है। मैं अभी उन सबको आपके समक्ष उपस्थित करता हूँ। बंदी के इतना कहते ही बंदी से शास्त्रार्थ में हार जाने के बाद जल में डुबोये गये सार ब्राह्मण जनक की सभा में आ गये जिनमें अष्टावक्र के पिता कहोड़ भी थे।

अष्टावक्र ने अपने पिता के चरणस्पर्श किये। तब कहोड़ ने प्रसन्न होकर कहा कि पुत्र! तुम जाकर समंगा नदी में स्नान करो, उसके प्रभाव से तुम मेरे शाप से मुक्त हो जाओगे। तब अष्टावक्र ने इस स्थान में आकर समंगा नदी में स्नान किया और उसके सारे वक्र अंग सीधे हो गये।

Sunday, 2 April 2017

क्या हिन्दू धर्म और सनातन धर्म एक हैं?

क्या हिन्दू धर्म और सनातन धर्म एक हैं?

हर धर्म को एक विश्वास या एक सिद्धांत से जोड़ कर देखा जाता है। लेकिन आज के स्पॉट में सद्‌गुरु बड़े ही साफ शब्दों में यह स्पष्ट कर रहे हैं कि सनातन धर्म विश्वास करना नहीं खोजना सिखाता है। तो फिर हिन्दू धर्म क्या है? क्या यह सनातन धर्म का दूसरा नाम है? या फिर यह कुछ अलग है?

आप लोग सनातन धर्म को एक यूनिवर्सिटी के मंच पर लाने की कोशिश कर रहे हैं। इसका मतलब हुआ कि आप एक विशाल और परम प्रक्रिया को एक सीमित और कहीं छोटे मंच पर रखने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि अब वो समय आ गया है, जब ऐसा करना ही होगा, इसमें कोई दो राय ही नहीं है। लेकिन ऐसा करते समय कुछ बुनियादी सावधानियां बरतने की जरूरत है, ताकि यह किसी धर्म शास्त्र के अध्ययन जैसा बन कर न रह जाए, बल्कि यह लोगों के भीतर ज्ञान की लालसा जगाने का कारण बन कर उभरे।
सनातन धर्म कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं है, जो आपको बताए कि आप इस पर विश्वास कीजिए, वर्ना आप मर जाएंगे। यह इस तरह की संस्कृति नहीं है। यह आपको कुछ ऐसा बताता है, जो आपके मन में सवाल उठाए, ऐसे सवाल जिनके बारे में शायद आपने कभी कल्पना भी नहीं की हो।
मानव बुद्धि या समझ की प्रकृति ही खोजने की है। लोगों के भीतर यह जिज्ञासा इसलिए खत्म होती गई, क्योंकि उन पर विश्वास या मत थोपे गए।
सनातन धर्म की पूरी प्रक्रिया आपके भीतर प्रश्नों को खड़ा करने के लिए ही है। और सबसे बड़ी बात यह आपके सवालों के ‘रेडिमेड जवाब’ नहीं देता, बल्कि यह आपके भीतर इस तरह से सवाल खड़े करने की गहनता लाता है कि आप खुद ब खुद इन सवालों के जवाब का स्रोत तलाश लेते हैं। तो जिज्ञासा का वो आयाम या स्तर लाने के लिए इसमें कुछ महत्वपूर्ण सावधानियां बरतने की जरूरत है, ताकि यह एक दूसरी तरह का आध्यात्मिक अध्ययन भर बन कर न रह जाए।
सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि भारत से बाहर भी बहुत सारे लोगों में कुछ चीजों को स्थापित करने की बेचैनी धीरे-धीरे घर करती जा रही है। दूसरे धर्मों के आगे निकल जाने की भावना पैदा हो रही है। इस कोशिश में वह पूरे शाश्वत व सनातन ज्ञान को महज एक पवित्र किताब या ग्रंथ तक सीमित करने की कोशिश कर रहे हैं और अपेक्षा कर रहे हैं कि सभी इसका अनुसरण करें। यह कभी हमारा तरीका रहा ही नहीं है। लोग आज यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि हरेक व्यक्ति को गीता का अनुसरण करना चाहिए। जबकि ऐसा नहीं है। अर्जुन ने खुद गीता के उपदेश के दौरान लाखों सवाल किए। अगर आप बस सीधे-सीधे गीता का अनुसरण करेंगे, तो गीता के उपदेश का बुनियादी मकसद ही खो जाएगा।
हमारा बुनियादी मकसद अपने तरीकों को दूसरों पर थोपने की बजाय दुनिया में हरेक इंसान के भीतर खोजने का भाव लाने का होना चाहिए। वैसे भी कोई ‘हमारा तरीका’ नहीं है। हमें किसी खास तरीके या रास्ते की जरूरत ही नहीं है। हमने यह खोजा है और पाया है कि अगर अपने जीवन को इस तरह से संचालित करें तो हमेशा एक बेहतर परिणाम मिलेगा – व्यक्ति के लिए भी और एक बड़े स्तर पर समाज के लिए भी। लेकिन फिर भी हम यह नहीं कह रहे हैं कि ‘बस यही तरीका’ है। इस पर रोज सवाल उठाए जा सकते हैं – लाखों सवाल पूछे जा सकते हैं। अगर आप सवालों से डरते हैं तो इसका मतलब है कि आपका तरीका, आपका विश्वास एक बेहद कच्ची जमीन पर खड़ा है, जो मेरे दो-चार सवाल पूछते ही भरभरा कर गिर पड़ेगा। अगर आप सच्चाई पर खड़े हैं तो मैं आपसे लाखों सवाल भी पूछ लूं तो दिक्क्त क्या है? सवालों से दिक्कत तभी है, जब आप झूठ पर खड़े होते हैं। कभी कोई सवाल गलत नहीं होता, हां जवाब गलत हो सकते हैं।
तो सनातन धर्म का मकसद लोगों में जिज्ञासा की गहन भावना को जगाना होना चाहिए – अपने विचार थोपने का नहीं, क्योंकि यह तरीका काम भी नहीं करेगा। अगर कोई भयानक युद्ध या कोई ऐसी भयानक दुर्घटना ना हो जाए जो इस धरती पर मानव-जीवन की नींव ही हिला दे, तो आप देखेंगे अगले पचास सालों में ‘योग’ किसी भी धर्म से ज्यादा प्रभावशाली होगा। जब हम ‘योग’ की बात करते हैं तो हमारा मतलब उन अभ्यासों से है, जिनकी ओर सनातन धर्म के सिद्धांत इशारा करते हैं।
मानवता के इतिहास में पहली बार मावन-बुद्धि इतनी विकसित और पुष्पित-पल्लवित हो रही है। इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। सदियों से ऐसा होता आया है कि पूरे गांव में एकाध इंसान ऐसा होता था, जो सबकी तरफ से सोचता था। अब वो समय चला गया।
आप देखेंगे कि आने वाले पचास सालों में सिर्फ वही सिद्धांत, वही तरीका काम करेगा, जिसके पीछे कोई सार्थक कारण हो और जो ऐसा व्यावहारिक समाधान पेश कर सके जिसे आप अपनी जिंदगी में लागू कर सकते हों।
जल्द ही हर आदमी अपने बारे में अपने तरीके से सोचेगा। और फिर दुनिया की हर चीज, हर आदमी की पहुंच में होगी। और जब यह होगा तब यह नीति काम नहीं करेगी कि – अगर मेरे अनुसार नहीं चले तो आप गए काम से।
जो सिद्धांत आपकी समस्याओं का समाधान स्वर्ग में दिलाने की बात करेंगे, वो काम नहीं करेंगे। दर्शन की ऐसी तमाम व्याख्याएं, जो तर्कों की कसौटी पर नहीं टिकेंगी, उनके कोई मायने नहीं होंगे। लोगों को हर समस्या का व्यावहारिक समाधान चाहिए। आप देखेंगे कि आने वाले पचास सालों में सिर्फ वही सिद्धांत, वही तरीका काम करेगा, जिसके पीछे कोई सार्थक कारण हो और जो ऐसा व्यावहारिक समाधान पेश कर सके जिसे आप अपनी जिंदगी में लागू कर सकते हों। दूसरी तरफ ऐसे समाधान जिसे अमल में न लाया जा सके, जिसे आपने देखा ही न हो, धीरे-धीरे मानव-जाति के लिए कम महत्वपूर्ण होते जाएंगे। यह तो केवल तभी संभव था जब इंसान की पहुंच अपने आसपास की घटनाओं तक या तो स्वाभाविक तौर पर अथवा जानबूझ कर, बेहद सीमित थी।
सनातन धर्म को आगे लाने का यह सबसे उपयुक्त समय है। साथ ही यह ध्यान में रखना भी बेहद महत्वपूर्ण है कि इसे हिन्दू धर्म के तौर पर प्रचारित न किया जाए, क्योंकि यह हिंदू धर्म है ही नहीं। हिंदुत्व का विचार ही अपने आप में एक विदेशी अवधारणा है, जो इस देश में कभी मौजूद ही नहीं थी। हिंदू शब्द इसकी भौगोलिक पहचान के चलते सामने आया। जो भूमि हिमालय और हिंद महासागर के बीच में पड़ती थी, उसे हिन्दू कहा गया। मेरी इस बात की वजह से भारत में काफी विवाद खड़ा हो रहा है, खासकर भारत का राष्ट्रीय मीडिया इसे काफी उठा रहा है, कि मैं कहता हूं कि भारत में पैदा हुआ एक केंचुआ भी हिन्दू केंचुआ है। इस पर वे चैंकते हुए अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। मैं कहता हूं, अगर आप अफ्रीका में पैदा हुए एक हाथी को अफ्रीकन हाथी कह सकते हैं तो फिर हिंदुस्तान में पैदा हुए एक केंचुए को एक हिन्दू केंचुआ कहने में समस्या क्या है? इसी तरह से यहां पैदा हुआ एक टिड्डा भी हिंदू है और इसी आधार पर आप भी हिंदू माने जाएंगे। इसी तरह जो इस धरती पर पैदा हुए वे हिन्दू कहलाये।
हमने अपनी पहचान इस धरती के भौगौलिक गुणों के साथ जोड़ ली। हमें अपनी समझ व बुद्धि से खोज करने और अपनी आध्यात्मिक प्रक्रिया खुद तैयार करने की आजादी छह से आठ हजार सालों तक मिली। यहां बिना किसी दूसरों के हस्तक्षेप या बिना दूसरों के आक्रमण के हम अपना संगीत, अपना गणित, अपना खगोल शास्त्र चरम ऊंचाइयों तक ले जा सके। ऐसा इसलिए संभव था, क्योंकि हिमालय और हिन्द महासागर हमारी रक्षा व बचाव करते थे। हम लोग अपनी इन दोनों भौगोलिक पहचानों के प्रति गहन सम्मान की वजह से खुद को हिंदू कहने लगे, क्योंकि इन दोनों के बिना हम हजारों सालों से चली आ रही अपनी संस्कृति को बचाए नहीं रख सकते थे।
जब कुछ लोग बाहर से यहां आएं तो वे सिर्फ इतना ही समझ पाए कि व्यक्ति या तो इस समूह से संबंधित हो सकता है या उस समूह से। ऐसे ही लोगों ने इस संस्कृति को हिंदुत्व का नाम दिया। उससे पहले तक यहां हिंदुत्व जैसी कोई चीज नहीं थी। इसलिए अब वो समय आ गया है कि हम खोजने के भाव को वापस लाएं। इसका किसी विश्वास या मत से संबंध नहीं है। यह ‘मेरा धर्म बनाम आपका धर्म’ का मामला नहीं है। यह इससे जुड़ा है कि हम अपने आसपास की हर चीज पर पूरे सम्मान के साथ गौर करें और महसूस करें कि हम क्या सर्वश्रेष्ठ कर सकते हैं। यही सनातन धर्म की प्रकृति है। यही वजह है कि यह सनातन और शाश्वत है। अगर आप अपने विश्वास या मत मुझ पर थोपेंगे तो यह कितनी देर तक काम करेगा। सनातम धर्म अगर शाश्वत है तो वह सिर्फ इसलिए, क्योंकि इसमें जो कुछ भी बताया गया है, वह इंसान के समझ या बुद्धि के अनुकूल है। यही वजह है कि यह हमेशा रह सकता है।
सनातन धर्म उस परम कल्याण की बात करता है, जो कि एकमात्र कल्याण है जिसकी पूरी दुनिया आकांक्षा कर सकती है। अगर हम वाकई चाहते हैं कि पूरी दुनिया सनातन धर्म का अभ्यास करे, तो यह बेहद महत्वपूर्ण है कि इसकी पहचान किसी भी रूप में स्थापित नहीं होनी चाहिए। मानव बुद्धि या समझ की प्रकृति ही खोजने की है। लोगों के भीतर यह जिज्ञासा इसलिए खत्म होती गई, क्योंकि उन पर विश्वास या मत थोपे गए। उन्हें बताया गया ‘जो कुछ है, यही है’ और अगर आप इस पर विश्वास नहीं करेंगे तो आप जिंदा ही नहीं रह सकते। डर, अपराधबोध और पसंद का इस्तेमाल करके मानव बुद्धि की प्राकृतिक जिज्ञासा को जबरदस्त तरीके से खत्म कर दिया गया। मानवता के परम कल्याण के लिए यह बेहद जरूरी है कि हरेक व्यक्ति के जीवन में जिज्ञासा का एक गहन भाव लाया जाए। यही सनातन धर्म का असली लक्ष्य है।