Sunday, 14 January 2018

भारत का सर्वप्रमुख धर्म वैदिक सनातन हिन्दू धर्म है

वैदिक सनातन हिन्दू धर्म

भारत का सर्वप्रमुख धर्म वैदिक सनातन हिन्दू धर्म है, जिसे इसकी प्राचीनता एवं विशालता के कारण 'सनातन धर्म' भी कहा जाता है। वैदिक धर्म किसी व्यक्ति विशेष द्वारा स्थापित धर्म नहीं है, बल्कि यह प्राचीन काल से चले आ रहे विभिन्न धर्मों, मतमतांतरों, आस्थाओं एवं विश्वासों का समुच्चय है। एक विकासशील धर्म होने के कारण विभिन्न कालों में इसमें नये-नये आयाम जुड़ते गये। वास्तव में हिन्दू धर्म इतने विशाल परिदृश्य वाला धर्म है कि उसमें आदिम ग्राम देवताओं, भूत-पिशाची, स्थानीय देवी-देवताओं, झाड़-फूँक, तंत्र-मत्र से लेकर त्रिदेव एवं अन्य देवताओं तथा निराकार ब्रह्म और अत्यंत गूढ़ दर्शन तक- सभी बिना किसी अन्तर्विरोध के समाहित हैं और स्थान एवं व्यक्ति विशेष के अनुसार सभी की आराधना होती है। वास्तव में हिन्दू धर्म लघु एवं महान परम्पराओं का उत्तम समन्वय दर्शाता है। एक ओर इसमें वैदिक तथा पुराणकालीन देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना होती है, तो दूसरी ओर कापलिक और अवधूतों द्वारा भी अत्यंत भयावह कर्मकांडीय आराधना की जाती है। एक ओर भक्ति रस से सराबोर भक्त हैं, तो दूसरी ओर अनीश्वर-अनात्मवादी और यहाँ तक कि नास्तिक भी दिखाई पड़ जाते हैं। देखा जाय, तो हिन्दू धर्म सर्वथा विरोधी सिद्धान्तों का भी उत्तम एवं सहज समन्वय है। यह हिन्दू धर्मावलम्बियों की उदारता, सर्वधर्मसमभाव, समन्वयशीलता तथा धार्मिक सहिष्णुता की श्रेष्ठ भावना का ही परिणाम और परिचायक है।

हिन्दू धर्म के स्रोत

हिन्दू धर्म की परम्पराओं का अध्ययन करने हेतु हज़ारों वर्ष पीछे वैदिक काल पर दृष्टिपात करना होगा। हिन्दू धर्म की परम्पराओं का मूल वेद ही हैं। वैदिक धर्म प्रकृति-पूजक, बहुदेववादी तथा अनुष्ठानपरक धर्म था। यद्यपि उस काल में प्रत्येक भौतिक तत्त्व का अपना विशेष अधिष्ठातृ देवता या देवी की मान्यता प्रचलित थी, परन्तु देवताओं में वरुण, पूषा, मित्र, सविता, सूर्य, अश्विन, उषा, इन्द्र, रुद्र, पर्जन्य, अग्नि, वृहस्पति, सोम आदि प्रमुख थे। इन देवताओं की आराधना यज्ञ तथा मंत्रोच्चारण के माध्यम से की जाती थी। मंदिर तथा मूर्ति पूजा का अभाव था। उपनिषद काल में हिन्दू धर्म के दार्शनिक पक्ष का विकास हुआ। साथ ही एकेश्वरवाद की अवधारणा बलवती हुई। ईश्वर को अजर-अमर, अनादि, सर्वत्रव्यापी कहा गया। इसी समय योग, सांख्य, वेदांत आदि षड दर्शनों का विकास हुआ। निर्गुण तथा सगुण की भी अवधारणाएं उत्पन्न हुई। नौंवीं से चौदहवीं शताब्दी के मध्य विभिन्न पुराणों की रचना हुई। पुराणों में पाँच विषयों (पंच लक्षण) का वर्णन है-

सर्ग (जगत की सृष्टि),
प्रतिसर्ग (सृष्टि का विस्तार, लोप एवं पुन: सृष्टि),
वंश (राजाओं की वंशावली),
मन्वंतर (भिन्न-भिन्न मनुओं के काल की प्रमुख घटनाएँ) तथा
वंशानुचरित (अन्य गौरवपूर्ण राजवंशों का विस्तृत विवरण)।
इस प्रकार पुराणों में मध्य युगीन धर्म, ज्ञान-विज्ञान तथा इतिहास का वर्णन मिलता है। पुराणों ने ही हिन्दू धर्म में अवतारवाद की अवधारणा का सूत्रपात किया। इसके अलावा मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा, व्रत आदि इसी काल के देन हैं। पुराणों के पश्चात् भक्तिकाल का आगमन होता है, जिसमें विभिन्न संतों एवं भक्तों ने साकार ईश्वर की आराधना पर ज़ोर दिया तथा जनसेवा, परोपकार और प्राणी मात्र की समानता एवं सेवा को ईश्वर आराधना का ही रूप बताया। फलस्वरूप प्राचीन दुरूह कर्मकांडों के बंधन कुछ ढीले पड़ गये। दक्षिण भारत के अलवार संतों, गुजरात में नरसी मेहता, महाराष्ट्र में तुकाराम, पश्चिम बंगाल में चैतन्य महाप्रभु, उत्तर भारत में तुलसी, कबीर, सूर और गुरु नानक के भक्ति भाव से ओत-प्रोत भजनों ने जनमानस पर अपनी अमिट छाप छोड़ी।

हिन्दू धर्म की अवधारणाएँ एवं परम्पराएँ

हिन्दू धर्म की प्रमुख अवधारणाएं निम्नलिखित हैं-

ब्रह्म- ब्रह्म को सर्वव्यापी, एकमात्र सत्ता, निर्गुण तथा सर्वशक्तिमान माना गया है। वास्तव में यह एकेश्वरवाद के 'एकोऽहं, द्वितीयो नास्ति' (अर्थात् एक ही है, दूसरा कोई नहीं) के 'परब्रह्म' हैं, जो अजर, अमर, अनन्त और इस जगत का जन्मदाता, पालनहारा व कल्याणकर्ता है।
आत्मा- ब्रह्म को सर्वव्यापी माना गया है अत: जीवों में भी उसका अंश विद्यमान है। जीवों में विद्यमान ब्रह्म का यह अशं ही आत्मा कहलाती है, जो जीव की मृत्यु के बावजूद समाप्त नहीं होती और किसी नवीन देह को धारण कर लेती है। अंतत: मोक्ष प्राप्ति के पश्चात् वह ब्रह्म में लीन हो जाती है।
पुनर्जन्म- आत्मा के अमरत्व की अवधारणा से ही पुनर्जन्म की भी अवधारणा पुष्ट होती है। एक जीव की मृत्यु के पश्चात् उसकी आत्मा नयी देह धारण करती है अर्थात् उसका पुनर्जन्म होता है। इस प्रकार देह आत्मा का माध्यम मात्र है।
योनि- आत्मा के प्रत्येक जन्म द्वारा प्राप्त जीव रूप को योनि कहते हैं। ऐसी 84 करोड़ योनियों की कल्पना की गई है, जिसमें कीट-पतंगे, पशु-पक्षी, वृक्ष और मानव आदि सभी शामिल हैं। योनि को आधुनिक वैज्ञानिक भाषा में जैव प्रजातियाँ कह सकते हैं।
कर्मफल- प्रत्येक जन्म के दौरान जीवन भर किये गये कृत्यों का फल आत्मा को अगले जन्म में भुगतना पड़ता है। अच्छे कर्मों के फलस्वरूप अच्छी योनि में जन्म होता है। इस दृष्टि से मनुष्य सर्वश्रेष्ठ योनि है। परन्तु कर्मफल का अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति अर्थात् आत्मा का ब्रह्मलीन हो जाना ही है।
स्वर्ग-नरक- ये कर्मफल से सम्बंधित दो लोक हैं। स्वर्ग में देवी-देवता अत्यंत ऐशो-आराम की ज़िन्दगी व्यतीत करते हैं, जबकि नरक अत्यंत कष्टदायक, अंधकारमय और निकृष्ट है। अच्छे कर्म करने वाला प्राणी मृत्युपरांत स्वर्ग में और बुरे कर्म करने वाला नरक में स्थान पाता है।

स्वस्तिक
मोक्ष- मोक्ष का तात्पर्य है- आत्मा का जीवन-मरण के दुष्चक्र से मुक्त हो जाना अर्थात् परमब्रह्म में लीन हो जाना। इसके लिए निर्विकार भाव से सत्कर्म करना और ईश्वर की आराधना आवश्यक है।
चार युग- हिन्दू धर्म में काल (समय) को चक्रीय माना गया है। इस प्रकार एक कालचक्र में चार युग-कृत (सत्य), सत त्रेता, द्वापर तथा कलि-माने गये हैं। इन चारों युगों में कृत सर्वश्रेष्ठ और कलि निकृष्टतम माना गया है। इन चारों युगों में मनुष्य की शारीरिक और नैतिक शक्ति क्रमश: क्षीण होती जाती है। चारों युगों को मिलाकर एक महायुग बनता है, जिसकी अवधि 43,20,000 वर्ष होती है, जिसके अंत में पृथ्वी पर महाप्रलय होता है। तत्पश्चात् सृष्टि की नवीन रचना शुरू होती है।
चार वर्ण- हिन्दू समाज चार वर्णों में विभाजित है- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र। ये चार वर्ण प्रारम्भ में कर्म के आधार पर विभाजित थे। ब्राह्मण का कर्तव्य विद्यार्जन, शिक्षण, पूजन, कर्मकांड सम्पादन आदि है, क्षत्रिय का धर्मानुसार शासन करना तथा देश व धर्म की रक्षा हेतु युद्ध करना, वैश्यों का कृषि एवं व्यापार द्वारा समाज की आर्थिक आवश्यकताएँ पूर्ण करना तथा शूद्रों का अन्य तीन वर्णों की सेवा करना एवं अन्य ज़रूरतें पूरी करना। कालांतर में वर्ण व्यवस्था जटिल होती गई और यह वंशानुगत तथा शोषणपरक हो गई। शूद्रों को अछूत माना जाने लगा। बाद में विभिन्न वर्णों के बीच दैहिक सम्बन्धों से अन्य मध्यवर्ती जातियों का जन्म हुआ। वर्तमान में जाति व्यवस्था अत्यंत विकृत रूप में दृष्टिगोचर होती है।
चार आश्रम- प्राचीन हिन्दू संहिताएँ मानव जीवन को 100 वर्ष की आयु वाला मानते हुए उसे चार चरणों अर्थात् आश्रमों में विभाजित करती हैं- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। प्रत्येक की संभावित अवधि 25 वर्ष मानी गई। ब्रह्मचर्य आश्रम में व्यक्ति गुरु आश्रम में जाकर विद्याध्ययन करता है, गृहस्थ आश्रम में विवाह, संतानोत्पत्ति, अर्थोपार्जन, दान तथा अन्य भोग विलास करता है, वानप्रस्थ में व्यक्ति धीरे-धीरे संसारिक उत्तरदायित्व अपने पुत्रों को सौंप कर उनसे विरक्त होता जाता है और अन्तत: संन्यास आश्रम में गृह त्यागकर निर्विकार होकर ईश्वर की उपासना में लीन हो जाता है।
चार पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- ये चार पुरुषार्थ ही जीवन के वांछित उद्देश्य हैं उपयुक्त आचार-व्यवहार और कर्तव्य परायणता ही धर्म है, अपनी बौद्धिक एवं शरीरिक क्षमतानुसार परिश्रम द्वारा धन कमाना और उनका उचित तरीके से उपभोग करना अर्थ है, शारीरिक आनन्द भोग ही काम है तथा धर्मानुसार आचरण करके जीवन-मरण से मुक्ति प्राप्त कर लेना ही मोक्ष है। धर्म व्यक्ति का जीवन भर मार्गदर्शक होता है, जबकि अर्थ और काम गृहस्थाश्रम के दो मुख्य कार्य हैं और मोक्ष सम्पूर्ण जीवन का अंति लक्ष्य।
चार योग- ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग तथा राजयोग- ये चार योग हैं, जो आत्मा को ब्रह्म से जोड़ने के मार्ग हैं। जहाँ ज्ञान योग दार्शनिक एवं तार्किक विधि का अनुसरण करता है, वहीं भक्तियोग आत्मसमर्पण और सेवा भाव का, कर्मयोग समाज के दीन दुखियों की सेवा का तथा राजयोग शारीरिक एवं मानसिक साधना का अनुसरण करता है। ये चारों परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि सहायक और पूरक हैं।
चार धाम- उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम- चारों दिशाओं में स्थित चार हिन्दू धाम क्रमश: बद्रीनाथ, रामेश्वरम्, जगन्नाथपुरी और द्वारका हैं, जहाँ की यात्रा प्रत्येक हिन्दू का पुनीत कर्तव्य है।
प्रमुख धर्मग्रन्थ- हिन्दू धर्म के प्रमुख ग्रंथ हैं- चार वेद (ॠग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद) तेरह उपनिषद, अठारह पुराण, रामायण, महाभारत, गीता, रामचरितमानस आदि। इसके अलावा अनेक कथाएँ, अनुष्ठान ग्रंथ आदि भी हैं।
सोलह संस्कार
मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक सोलह अथवा सत्रह पवित्र संस्कार सम्पन्न किये जाते हैं-

गर्भाधान
पुंसवन (गर्भ के तीसरे माह तेजस्वी पुत्र प्राप्ति हेतु किया गया संस्कार),
सीमोन्तोन्नयन (गर्भ के चौथे महीने गर्भिणी स्त्री के सुख और सांत्वना हेतु),
जातकर्म (जन्म के समय)
नामकरण
निष्क्रमण (बच्चे का सर्वप्रथम घर से बाहर लाना),
अन्नप्राशन (पांच महीने की आयु में सर्वप्रथम अन्न ग्रहण करवाना),
चूड़ाकरण (मुंडन)
कर्णछेदन
उपनयन (यज्ञोपवीत धारण एवं गुरु आश्रम को प्रस्थान)
केशान्त अथवा गौदान (दाढ़ी को सर्वप्रथम काटना)
समावर्तन (शिक्षा समाप्त कर गृह को वापसी)
विवाह
वानप्रस्थ
संन्यास
अन्त्येष्टि
इस प्रकार हिन्दू धर्म की विविधता, जटिलता एवं बहु आयामी प्रवृत्ति स्पष्ट है। इसमें अनेक दार्शनिकों ने अलग-अलग प्रकार से ईश्वर एवं सत्य को समझने का प्रयास किया, फलस्वरूप अनेक दार्शनिक मतों का प्रादुर्भाव हुआ।

सत्य सनातन धर्म की जय हो

Friday, 12 January 2018

उन पांच समस्याओं पर विवेकानंद क्या सोचते थे जो आज भी देश की राह का सबसे बड़ा रोड़ा हैं

उन पांच समस्याओं पर विवेकानंद क्या सोचते थे जो आज भी देश की राह का सबसे बड़ा रोड़ा हैं?

गरीबी हो या शिक्षा या खेती या फिर महिला सशक्तिकरण, भारत की तमाम बड़ी समस्याओं के लिए स्वामी विवेकानंद के पास जो साफ दृष्टि थी वह आज भी प्रासंगिक है

कुछ समय पहले एक चर्चित साप्ताहिक पत्रिका ने स्वामी विवेकानंद पर विशेषांक निकाला था इसमें छपे अपने लेख में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के शब्द थे, ‘हमारे जीवन में स्वामी विवेकानंद एक ऐसे तारे के रूप में हैं जो ज्ञान और उम्मीदों से भरा है. उन्होंने यह साबित किया है कि बगैर देह के भी वे हर जगह के लोगों को हर वक्त प्रेरित करते रहेंगे आइए हम सब मिलकर उनके बताए रास्ते पर आगे बढ़ें’ विवेकानंद से प्रेरणा लेने की बात कहने वाले प्रणव मुखर्जी अकेले नहीं हैं वक्त में पीछे जाएं तो हस्तियों की यह लंबी सूची महात्मा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरु तक जाती है 12 जनवरी 1863 को बंगाल में जन्मे नरेंद्रनाथ दत्त बाद में रामकृष्ण परमहंस के शिष्य बने और फिर 25 साल की उम्र में ही गेरुआ पहनकर स्वामी विवेकानंद हो गए 1893 में शिकागो में हुई धर्म संसद में उनके भाषण ने उनकी ख्याति को आसमान पर पहुंचा दिया.गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था, ‘यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानंद को पढ़िये.’ लेकिन यह सिर्फ जानने भर की बात नहीं है. कई लोग हैं जो मानते हैं कि इस देश की समस्याओं के लिहाज से भी विवेकानंद के विचार उनके जाने के एक सदी बाद भी प्रासंगिक बने हुए हैं- न सिर्फ भारत के नीति निर्धारकों के लिए बल्कि विकास की पश्चिमी अवधारणा का अंधानुकरण करते उसके समाज के लिए भी.

गरीबी

देश में गरीबी कितनी है, इस बारे में सबसे चर्चित आंकड़ा अर्जुन सेनगुप्ता की अगुवाई वाली एक समिति का है इस समिति ने कुछ साल पहले यह अनुमान लगाया था कि देश की 77 फीसदी आबादी रोजाना 20 रुपये से कम पर गुजर बसर करने को मजबूर है
गरीब और गरीबी को लेकर किस तरह का रवैया अपनाया जाना चाहिए, यह बताते हुए विवेकानंद कहते हैं, ‘हर व्यक्ति को भगवान की तरह देखो आप किसी की मदद नहीं कर सकते, बस उसकी सेवा कर सकते हैं अगर आपके पास अधिकार हैं तो यह समझें कि भगवान के बच्चों की सेवा खुद उसकी ही सेवा है गरीबों की सेवा का काम पूजा भाव से करो’ वे आगे कहते हैं, ‘जब तक करोड़ों लोग भूखे और वंचित रहेंगे तब तक मैं हर उस आदमी को गद्दार मानूंगा जिसने गरीबों की कीमत पर शिक्षा तो हासिल की लेकिन, उनकी चिंता बिल्कुल नहीं की’विवेकानंद की इन दो बातों से साफ है कि वे इस बड़ी समस्या का समाधान गरीबों के लेकर रवैये में बदलाव’ के रूप में दे रहे हैं एक बड़ा वर्ग मानता है कि आज अगर देश के नीति निर्धारक गरीबों को लेकर सिर्फ अपना रवैया बदल लें तो फिर जो नीतियां बनेंगी, वे असल मायनों में गरीबपरस्त होंगी

खेती

भले ही देश की 70 फीसदी आबादी अब भी गुजर-बसर के लिए कृषि पर निर्भर हो लेकिन किसान और किसानी की दुर्दशा किसी से छिपी हुई नहीं है. कहने को तो सरकार हर साल बजट में किसानों के कल्याण के लिए लंबे-चौड़े वादे करती है. लेकिन बड़ी-बडी योजनाओं और कर्ज माफी की घोषणाओं होने के बावजूद नियमित अंतराल पर आने वाली किसानों की आत्महत्या की खबरें बताती हैं कि जमीनी हाल एक बड़ी हद तक जस का तस है.किसान और किसानी की समस्याओं के समाधान के बारे में स्वामी विवेकानंद कहते हैं, ‘किसानों की समस्या का समाधान शिक्षा के जरिए किया जा सकता है भारत अब भी ज्ञान के सीमित प्रसार की राह पर चल रहा है शिक्षा को मुट्ठी भर लोगों की जागीर बनाने से काम नहीं चलेगा एक बार ब्रिटेन में यह चर्चा गर्म हुई कि वहां के मजदूर काफी मजदूरी ले रहे हैं और जर्मनी के मजदूर सस्ते हैं इसके बाद ब्रिटेन ने एक आयोग जर्मनी भेजा इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि जर्मनी के मजदूर अधिक मजदूरी ले रहे हैं आयोग ने इसकी वजह शिक्षा को बताया भारत में जोर शिक्षा के प्रसार पर नहीं बल्कि इसे खुद तक सीमित रखने पर है’

शिक्षा

और वह शिक्षा कैसी हो, इसके बारे में स्वामी विवेकानंद कहते हैं, ‘शिक्षा का मतलब यह नहीं है कि दिमाग में कई ऐसी सूचनाएं एकत्रित कर ली जाएं जिसका जीवन में कोई इस्तेमाल ही नहीं हो हमारी शिक्षा जीवन निर्माण, व्यक्ति निर्माण और चरित्र निर्माण पर आधारित होनी चाहिए ऐसी शिक्षा हासिल करने वाला व्यक्ति उस व्यक्ति से अधिक शिक्षित माना जाएगा जिसने पूरे पुस्तकालय को कंठस्थ कर लिया हो अगर सूचनाएं ही शिक्षा होतीं तो फिर तो पुस्तकालय ही संत हो गए होते’ शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हुए वे आगे कहते हैं, ‘यूरोप के कई शहरों की यात्रा करके मैंने यह देखा कि वहां के गरीब भी शिक्षित हैं और उनकी हालत हमारे यहां के गरीबों से बहुत अच्छी है यह फर्क शिक्षा ने पैदा किया है शिक्षा आत्मबल देती है’

महिला सशक्तिकरण

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की सालाना रिपोर्टों को उठाकर देखा जाए तो पता चलता है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में स्थिति कितनी विकराल है सुरक्षा के अलावा महिलाएं और भी कई मोर्चों पर समस्याओं का सामना कर रही हैं उनके सशक्तिकरण को लेकर तमाम सरकारी योजनाओं और सैकड़ों की संख्या में गैर सरकारी संगठनों की सक्रियता के बावजूद घर से लेकर शिक्षा और रोजगार सहित हर जगह उनसे दोयम दर्जे के नागरिक की तरह व्यवहार होता है. महिलाओं की समस्याओं के समाधान के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग है लेकिन, नख-दंतविहीन यह आयोग सिर्फ नुमाइशी बनकर रह गया है.महिलाओं को सशक्त बनाने की राह सुझाते हुए स्वामी विवेकानंद कहते हैं, ‘महिलाओं को बस शिक्षा दे दो इसके बाद वे खुद बताएंगी उनके लिए किस तरह की सुधार जरूरत है मामूली दिक्कतों में भी उन्हें अब तक असहाय बने रहने, दूसरों पर निर्भर रहने और आंसू बहाने का ही प्रशिक्षण दिया गया है’ महिला सशक्तिकरण को देश की प्रगति से जोड़ने की वकालत करते हुए वे कहते हैं, ‘किसी भी देश की प्रगति का सबसे बेहतर पैमाना यह है कि वह देश अपनी महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार करता है जब तक महिलाओं की स्थिति नहीं सुधरेगी तब तक इस दुनिया के कल्याण की कोई संभावना नहीं है भारत में पुरुषों ने महिलाओं को उत्पादन मशीन बनाकर छोड़ा है अगर महिलाओं को सशक्त नहीं बनाया गया तो फिर तरक्की का कोई रास्ता नहीं बचता’

युवा सशक्तिकरण

देश की 51 फीसदी आबादी की उम्र 25 साल से कम है इस आधार पर कहना गलत नहीं होगा कि देश की प्रगति काफी हद तक युवाओं पर निर्भर करती है लेकिन क्या इस वर्ग को वे सुविधाएं मिल रही हैं जिसके आधार पर वह सशक्त बनकर देश की प्रगति में अपनी भूमिका निभा सके युवाओं का एक बड़ा वर्ग उसी वंचित समुदाय से है जो अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने को लेकर संघर्ष कर रहा है जो शिक्षित युवा है उसके बारे में कॉरपोरेट जगत की अक्सर शिकायत रहती है कि उसे जो शिक्षा मिली है उसमें गुणवत्ता का अभाव है आपराधिक घटनाओं में युवाओं की बढ़ती संलिप्तता पर अक्सर चिंता जताई जाती है. कहा जा सकता है कि जिस वर्ग पर देश की तरक्की का सबसे अधिक भार है, वह आज कई समस्याओं का सामना कर रहा है युवाओं को राह दिखाते हुए स्वामी विवेकानंद कहते हैं, ‘कोई भी समाज अपराधियों की सक्रियता की वजह से से गर्त में नहीं जाता बल्कि अच्छे लोगों की निष्क्रियता इसकी असली वजह है इसलिए नायक बनो हमेशा निडर रहो यह डर ही है जो दुख लाता है और भय की वजह है अपने आसपास को नहीं समझना कुछ प्रतिबद्ध लोग देश का जितना भला कर सकते हैं उतना भला कोई बड़ी भीड़ एक सदी में भी नहीं कर सकती मेरे बच्चो, आग में कूदने के लिए तैयार रहो भारत को सिर्फ उसके हजार नौजवानों का बलिदान चाहिए’युवाओं को सफलता का सूत्र देते हुए विवेकानंद कहते हैं, ‘कोई एक विचार लो और उसे अपनी जिंदगी बना लो उसी के बारे में सोचो और सपने में भी वही देखो उस विचार को जियो अपने शरीर के हर अंग को उस विचार से भर लो सफलता का रास्ता यही है जब तुम कोई काम कर रहे हो तो फिर किसी और चीज के बारे में मत सोचो इसे पूजा की तरह करो इस दुनिया में आए हो तो अपनी छाप छोड़कर जाओ ऐसा नहीं किया तो फिर तुझमें और पेड़-पत्थरों में अंतर क्या रहा? वे भी पैदा होते हैं और नष्ट हो जाते हैं’

Sunday, 7 January 2018

आदित्य हृदय स्तोत्र संपूर्ण पाठ

आदित्य हृदय स्तोत्र संपूर्ण पाठ

आदित्य ह्रदय स्तोत्र का पाठ नियमित  करने से अप्रत्याशित लाभ मिलता है। आदित्य हृदय स्तोत्र के पाठ से नौकरी में पदोन्नति, धन प्राप्ति, प्रसन्नता, आत्मविश्वास के साथ-साथ समस्त कार्यों में सफलता मिलती है। हर मनोकामना सिद्ध होती है। सरल शब्दों में कहें तो आदित्य ह्रदय स्तोत्र हर क्षेत्र में चमत्कारी सफलता देता है। पढ़ें संपूर्ण पाठ...  

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्‌ । रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्‌ ॥1॥

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्‌ । उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥2॥

राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम्‌ । येन सर्वानरीन्‌ वत्स समरे विजयिष्यसे ॥3॥

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्‌ । जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्‌ ॥4॥

सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम्‌ । चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्‌ ॥5॥

 

रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्‌ । पुजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्‌ ॥6॥

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन: । एष देवासुरगणांल्लोकान्‌ पाति गभस्तिभि: ॥7॥

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति: । महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यापां पतिः ॥8॥

पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु: । वायुर्वहिन: प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर: ॥9॥

आदित्य: सविता सूर्य: खग: पूषा गभस्तिमान्‌ । सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर: ॥10॥

 

हरिदश्व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान्‌ । तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्‌ ॥11॥

हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि: । अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशन: ॥12॥

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग: । घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥13॥

आतपी मण्डली मृत्यु: पिगंल: सर्वतापन:। कविर्विश्वो महातेजा: रक्त:सर्वभवोद् भव: ॥14॥

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावन: । तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्‌ नमोऽस्तु ते ॥15॥

 

नम: पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नम: । ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नम: ॥16॥

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नम: । नमो नम: सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नम: ॥17॥

नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नम: । नम: पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ॥18॥

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे । भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम: ॥19॥

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने । कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम: ॥20॥

 

तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे । नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥21॥

नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभु: । पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि: ॥22॥

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित: । एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्‌ ॥23॥

देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनां फलमेव च । यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमं प्रभु: ॥24॥

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च । कीर्तयन्‌ पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव ॥25॥

 

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगप्ततिम्‌ । एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥26॥

अस्मिन्‌ क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि । एवमुक्ता ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्‌ ॥27॥

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्‌ तदा ॥ धारयामास सुप्रीतो राघव प्रयतात्मवान्‌ ॥28॥

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्‌ । त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्‌ ॥29॥

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम्‌ । सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत्‌ ॥30॥

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण: । निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥31॥

।।सम्पूर्ण ।।