Friday, 27 January 2017

चलो आज आपको भगवान श्री राम जी के वंश के बारे में बताता हूँ

चलो आज आपको भगवान श्री राम जी के वंश के बारे में बताता हूँ |
ब्रह्मा जी की उन्चालिसवी पीढ़ी में भगवाम श्री राम का जन्म हुआ था |
हिंदू धर्म में श्री राम को श्री हरि विष्णु का सातवाँ अवतार माना जाता है |
वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे - इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त,करुष, महाबली, शर्याति और पृषध |

श्री राम का जन्म इक्ष्वाकु के कुल में हुआ था और जैन धर्म के तीर्थंकर निमि भी इसी कुल के थे |
मनु के दूसरे पुत्र इक्ष्वाकु से विकुक्षि, निमि और दण्डक पुत्र उत्पन्न हुए |
इस तरह से यह वंश परम्परा चलते-चलते हरिश्चन्द्र, रोहित, वृष, बाहु और सगरतक पहुँची | इक्ष्वाकु प्राचीन कौशल देश के राजा थे और इनकी राजधानी अयोध्या थी |
रामायण के बालकांड में गुरु वशिष्ठ जी द्वारा राम के कुल का वर्णन किया गया है जो इस प्रकार है :-

1 - ब्रह्मा जी से मरीचि हुए,
2 - मरीचि के पुत्र कश्यप हुए,
3 - कश्यप के पुत्र विवस्वान थे,
4 - विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए.वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था,
5 - वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था, इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुलकी स्थापना की |
6 - इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए,
7 - कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था,
8 - विकुक्षि के पुत्र बाण हुए,
9 - बाण के पुत्र अनरण्य हुए,
10- अनरण्य से पृथु हुए,
11- पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ,
12- त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए,
13- धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था,
14- युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए,
15- मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ,
16- सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित,
17- ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए,
18- भरत के पुत्र असित हुए,
19- असित के पुत्र सगर हुए,
20- सगर के पुत्र का नाम असमंज था,
21- असमंज के पुत्र अंशुमान हुए,
22- अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए,
23- दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए, भागीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतारा था.भागीरथ के पुत्र ककुत्स्थ थे |
24- ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए, रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया, तब से श्री राम के कुल को रघु कुल भी कहा जाता है |
25- रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए,
26- प्रवृद्ध के पुत्र शंखण थे,
27- शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए,
28- सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था,
29- अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग हुए,
30- शीघ्रग के पुत्र मरु हुए,
31- मरु के पुत्र प्रशुश्रुक थे,
32- प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए,
33- अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था,
34- नहुष के पुत्र ययाति हुए,
35- ययाति के पुत्र नाभाग हुए,
36- नाभाग के पुत्र का नाम अज था,
37- अज के पुत्र दशरथ हुए,
38- दशरथ के चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हुए |

इस प्रकार ब्रह्मा की उन्चालिसवी (39) पीढ़ी में श्रीराम का जन्म हुआ |

नोट : -अपने बच्चों को बार बार पढ़वाये और उन्हे हिन्दू धर्म की महता के बारे में समझायें |

बोलिये सियावर रामचन्द्र की जय

Thursday, 26 January 2017

वैतरणी दे पार कर, पूजे सब संसार

वैतरणी दे पार कर, पूजे सब संसार

अंग अंग में देवता, बहे दूध की धार || वैतरणी दे पार कर, पूजे सब संसार || युगों-युगों से गौमाता हमें आश्रय देते हुए हमारा लालन-पालन करती आ रही है हमारी जन्मदात्री माँ तो हमें कुछ ही बरस तक दूध पिला सकी परन्तु यह पयस्विनी तो जन्म से अब तक हमें पय-पान कराती रही हमारी इस नश्वर काया की पुष्टता के पीछे है उसके चारों थन जिस बलवान शरीर पर हमें होता अभिमान वह विकसित होता इस गोमाता के समर्पण से क्योंकि उसने अपने बछ्ड़े का मोह त्यागकर ममता से हमें केवल दूध ही नहीं पिलाया बल्कि हमें अपनाया भी वह गोमाता जिसके हर अंग में बिराजते हैं देवता तैतीस करोड़ जो दिखाती हमें स्वर्ग की राह जिसकी पूंछ पकड़कर पार होते हम भवसागर वह स्वयं में भी है ममता का अथाह सागर बदले में हम उसे क्या दे पाए वही सूखा भूसा वही सीमित चूनी हरे चारे के नाम पर सूखी घास वह तो यह भी सह लेती यदि हम दे पाते उसे थोड़ी सी पुचकार थोड़ा प्यार थोड़ी सी छाँव के साथ अपना सामीप्य और स्नेह उसने तो हमें अपना लिया अपने बछ्ड़े तक उसने किये समर्पित हमारा बोझ उठाने को परन्तु क्या हम उसे अपना पाए जब तक मिला ढूध उसे तभी तक पाला और जब सूखा दूध उसे कौडियों में बेच डाला और ढूंढने लगे दुधारी गाय आखिर हमें दुधारी गाय ही क्यों भाती है क्या गोबर वरदान नहीं क्या गोमूत्र अमृत नहीं वह तो देवी ठहरी पर हममें से कुछ एक मानव हैं या दानव जो मात्र आहार के निमित्त गाय का वध तक कर देते और दुहाई देते कुरीतियों की व्यर्थ तर्क-वितर्क करते अभी समय है सुधर जाएँ सम्मान दें गौ-माता को प्रोत्साहन दें गोपालकों को यदि हम नहीं चेते समय रहते तो शायद इतिहास में हम ही ना रहें | माता वध सम गोकुशी, निंदनीय यह काज | जग में जो ऐसा करे, उसको त्यागौ आज ||

गाय का आध्यात्मिक महत्वः

गाय का आध्यात्मिक महत्वः

गाय का विश्व स्तर पर आध्यात्मिक महत्व है, ''गावो विश्वस्य मातरः''। नवग्रहों सूर्य, चंद्रमा, मंगल, राहु, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, केतु के साथ साथ वरूण, वायु आदि देवताओं को यज्ञ में दी हुई प्रत्येक आहुति गाय के घी से देने की परंपरा है, जिससे सूर्य की किरणों को विशेष ऊर्जा मिलती है। यही विशेष ऊर्जा वर्षा का कारण बनती है, और वर्षा से ही अन्न, पेड़-पौधों आदि को जीवन प्राप्त होता है। हिंदू धर्म में जितने धार्मिक कार्य, धार्मिक संस्कार होते हैं जैसे नामकरण, गर्भाधान, जन्म आदि सभी में गाय का दूध, गोबर, घी, आदि का ही प्रयोग किया जाता है जहां विवाह संस्कार आदि होते हैं वहां भी गोबर के लेप से शुद्धिकरण की क्रिया करते हैं। विवाह के समय गोदान का भी बहुत महत्व माना गया है। जनना शौच और मरणाशौच मिटाने के लिए भी गाय का गोबर और गौमूत्र का प्रयोग किया जाता है। इसकी धार्मिक वजह यह भी है कि गाय के गोबर में लक्ष्मी जी का और गोमूत्र में गंगा जी का निवास है। वैतरणी पार करने के लिए गोदान की प्रथा आज भी हमारे समाज में मौजूद है, श्राद्ध कर्म में भी गाय के दूध की खीर का प्रयोग किया जाता है क्योंकि इसी खीर से पितरों की ज्यादा से ज्यादा तृप्ति होती है। पितर, देवता, मनुष्य आदि सभी को शारीरिक बल गाय के दूध और घी से ही मिलता है। गाय के शारीरिक अंगों में सभी देवताओं का निवास माना जाता है। गाय की छाया भी बेहद शुभ प्रद मानी गयी है। गाय के दर्शन मात्र से ही यात्रा की सफलता स्वतः सिद्ध हो जाती है। दूध पिलाती गाय का दर्शन तो बेहद शुभ माना जाता है।

गाय से संबंधित धार्मिक वृत व उपवासः

गाय से संबंधित धार्मिक वृत व उपवासः

1. गोपद्वमव्रतः- सुख, सौभाग्य, संपत्ति, पुत्र, पौत्र, आदि के सुखों को देने वाला है। 2. गोवत्सद्वादशी व्रतः- इस व्रत से समस्त मनोकामनाऐं पूर्ण होती हैं। 3. गोवर्धन पूजाः- इस लोक के समस्त सुखों में वृद्धि के साथ मोक्ष की प्राप्ति होती है। 4. गोत्रि-रात्र व्रतः- पुत्र प्राप्ति, सुख भोग, और गोलोक की प्राप्ति होती है। 5. गोपाअष्टमीः- सुख सौभाग्य में वृद्धि होती है। 6. पयोव्रतः- पुत्र की प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दम्पत्तियों को संतान प्राप्ति होती है।

खेती में गाय और केंचुए को लेकर चल रही है

खेती में गाय और केंचुए को लेकर चल रही है

कपड़े का मशहूर ब्रांड गैप समाज और कारोबार में बढ़त पाने की खातिर गोबर पर आधारित प्राकृतिक खेती का समर्थन कर रहा है। यही वजह है कि भारत में गायों की संख्या कम होने से गैप चिंतित है। इस ब्रांड का ऑर्गेनिक फार्मिंग यानी जैविक खेती के समर्थकों से वैचारिक टकराव चल रहा है। कंपनी का मानना है कि अगर उसे अपने ब्रांड के लिए समाज में एक निश्चित मुकाम दिलानी है तो इसका सबसे बढ़िया तरीका है कि प्राकृतिक खेती का समर्थन किया जाए। इस तरह की खेती के लिए गाय का गोबर और गोमूत्र बहुत ही जरूरी तत्त्व हैं। उत्तर भारत में भैंस के दूध की ज्यादा कीमत मिलने से और जैविक खाद के लिए सब्सिडी के अभाव ने देश के उत्तरी इलाकों में गायों की आबादी को घटाने में बड़ी भूमिका निभाई है। गैप को उम्मीद है कि उसे पर्याप्त संख्या में गायें मिल जाएंगी और भविष्य के ब्रांड की खातिर उसके कपास के किसानों को गोबर वाली खाद मिल जाएगी। इसका कहना है कि कर्ज के बोझ और उर्वरक की ऊंची लागत की वजह से आत्महत्या के लिए मजबूर होने वाले कपास किसानों को राहत पहुंचाना उसका मुख्य मकसद है। गैप की ग्लोबल पार्टनरशिप डायरेक्टर लक्ष्मी मेनन भाटिया कहती हैं - जीरो बजट फार्मिंग के जरिये कपास उगाने में मदद देकर हम इसे रोकना चाहते हैं, ऐसी खेती के लिए मुख्य इनपुट गाय के गोबर से बनी खाद होगी। पिछले महीने कंपनी को प्राकृतिक खेती के गुरु सुभाष पालेकर की सेवाएं मिलीं। पालेकर जीवमूत्र या गाय के गोबर से बनी खाद के इस्तेमाल की बाबत सैकड़ों किसानों को शिक्षित करेंगे। उनका कहना है कि गाय जितनी कम उर्वर होगी, उसके गोबर से बनने वाली खाद उतनी ही बेहतर होगी। काफी सहज तरीके से वह कहते हैं कि हमारे तौर-तरीके से मिश्रण तैयार कर पौधों में डाल दिया जाए और उसे प्राकृतिक तरीके से बढ़ने दिया जाए, जैसा कि वे जंगल में बिना सिंचाई व बिना खाद के ऐसा करते हैं। लेकिन विदर्भ के किसानों का कहना है कि यह उतना आसान या सस्ता नहीं है, जैसा कि लगता है। विदर्भ के किसान नेता विजय जयवंतिया कहते हैं - पालेकर से पूछिए कि अमरावती इलाके में प्राकृतिक खेती मशहूर क्यों नहीं है? जयवंतिया का कहना है कि एक ओर जहां रासायनिक उवर्रक के लिए सब्सिडी मुहैया कराई जाती है, वहीं दूसरी ओर गाय पालने या चारे के लिए सब्सिडी सरकार नहीं देती। इसके अलावा इसमें श्रमिक की दरकार होती है जो कि खर्चीला है। फिलहाल गैप भारत सरकार से गठजोड़ करने के मसले पर काम कर रहा है और ग्रामीण विकास जैसे मंत्रालय को इसमें शामिल किया है ताकि मंत्रालय किसानों को प्राकृतिक खेती के विकल्प अपनाने के लिए दबाव डाल सके। गैप दूसरे ब्रांड से समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन इस कहानी में एक उलझन भी है। प्राकृतिक खेती के पालेकर जैसे अगुआ जैविक खेती के समर्थन में खड़े हैं, जो कि वैसे उर्वरक के जरिए किया जाता है जिसका निर्माण केंचुए करते हैं, ये केंचुए जैविक कूड़ा-करकट पर पलते हैं। इस मुद्दे पर आलोचना इस बात की होती है कि जैविक उर्वरक में ह्यूमस का अभाव होता है। ह्यूमस अवक्रमित जैविक पदार्थ है जो कि मिट्टी में मौजूद होता है। यह जमीन को उर्वरा बनाने में मदद करता है और नमी को बरकरार रखता है। पालेकर कहते हैं कि केंचुए ह्यूमस के निर्माण को रोकते हैं। ये कैडमियम, आर्सेनिक, सीसे और पारे का सेवन करते हैं और कार्बन छोड़ते हैं जो कि जलवायु परिवर्तन के अलावा आपको कैंसर जैसी बीमारी भी देता है। जैविक व प्राकृतिक खेती पर वैश्विक स्तर पर बहस होती रही है। मुख्य विवाद यह है कि एक ओर जहां जैविक खेती में पौधों के लिए मानव के उपयोग की आवश्यकता पर जोर नहीं दिया जाता, वहीं ऐसा विचार प्राकृतिक खेती से केंद्र में होता है। गोबर और गोमूत्र के इस्तेमाल से उर्वरक व कीटनाशक तैयार करने के साथ-साथ बीजों में सुधार के फॉर्मूले के बारे में पालेकर कई तरीके बताते हैं। उनका कहना है कि सिर्फ एक गाय 30 एकड़ जमीन को उर्वरा बना सकती है। कीड़ों के सामने फेंकने से पहले गाय केगोबर से ह्यूमस बनाया जा सकता है। जैविक खेती की आलोचना करने वाले कहते हैं - जैविक कचरे का सेवन करने वाले कीड़े ह्यूमस के निर्माण को रोक देते हैं। ये कीड़े वहां मौजूद सभी कैडमियम, आर्सेनिक, सीसे और पारे खा जाते हैं और कार्बन उत्सर्जित करते हैं, जो जलवायु परिवर्तन में योगदान देता है। इसे खतरनाक बताते हुए वे कहते हैं कि उर्वरक में मौजूद कैडमियम केतत्त्व से कैंसर हो सकता है। लेकिन देविंदर शर्मा जैसे कृषि वैज्ञानिक देवेंदर शर्मा इसे खारिज करते हैं। पहले भी मिट्टी में स्वाभाविक रूप से केंचुए होते थे। वे पूछते हैं कि क्या वे ह्यूमस को रोकते हैं? पालेकर यह अंतर निजी दृष्टिकोण से कर रहे हैं। उनका कहना है कि इसका कोई मतलब नहीं है और यह गलत है। गाय का गोबर और केंचुआ एक दूसरे के पूरक हैं। उनका कहना है कि जरूरत है वर्मिकंपोस्ट इंडस्ट्री को समाप्त करने की। हमें प्राकृतिक रूप से मौजूद केंचुए और गाय के गोबर पर निर्भर होना चाहिए, न कि हमें इन दोनों का एक दूसरे के खिलाफ उठने वाले विवादों में फंसना चाहिए। हालांकि गैप ने फैसला किया है कि वह गाय के पक्ष में खड़ी होगी, न कि केंचुए के पक्ष में। पालेकर और उनके समर्थक भी गाय पर ही भरोसा कर रहे हैं, न कि आयातित दूसरे सामान पर। उनका कहना है कि सिर्फ एक गाय के जरिए 30 एकड़ जमीन उपजाऊ बन सकती है। एपेरेल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के जरिए गैप जल्दी ही आपूर्तिकर्ताओं तक पहुंचेगी और दूसरे ब्रांड तक भी। ऑर्गेनिक उत्पाद को प्रमाणित करने वाली एजेंसी इकोसर्ट के मुताबिक, इस दौड़ में कीड़े काफी आगे हैं और साल 2007-08 में वैश्विक स्तर पर जैविक कपास के उत्पादन में 152 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। उत्पादन के मामले में भारत का स्थान सीरिया के बाद दूसरा है।

कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था में गाय की भूमिका

कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था में गाय की भूमिका

भारतीय संस्कृति में गाय का महत्व, गायत्री गंगा और गीता से भी बढ़कर है, क्योंकि गायत्री की साधना में कठिन तपस्या अपेक्षित हैं, गंगा के सेवन के लिये भी कुछ त्याग करना ही पड़ता है और गीता को जितनी बार पढ़ोगे उसमें हर बार कुछ न कुछ नया मिलता है, जिसका रहस्य समझना कठिन है, लेकिन गौ का लाभ तो घर बैठे ही मिल जाता है। वेदों का कथन है कि यदि किसी को इस माया राज्य में सब प्रकार का वैभव प्राप्त करना है तो गौ माता की प्रमुख रूप से सेवा करें। यहाँ प्रश्न पैदा होता है कि गौ की महिमा का शास्त्रों में जो वर्णन है, क्या उसे सत्य माना जा सकता है ? इस प्रश्न का समाधान है कि शास्त्र कभी झूठ नहीं बोलते। निश्चय ही गाय से सब प्रकार के वैभव प्राप्त होते हैं। जो एक गाय न्यून से न्यून दो सेर दूध देती हैं और दूसरी बीस सेर तो प्रत्येक गाय के ग्यारह सेर दूध होने में कोई शंका नहीं। इस हिसाब से एक मास में सवा आठ मन दूध होता है। एक गाय कम से कम छह महीने और दूसरी गाय अधिक से अधिक 18 महीने तक दूध देती है, तो दोनों का मध्य भाग प्रत्येक गाय का दूध देने में बारह महीने होते हैं। इस हिसाब से 12 महीनों का दूध 99 मन होता है। इतने दूध को औटकर प्रति सेर में एक छटाँक चावल और डेढ़ छटाँक चीनी डालकर खीर बनाकर खाये तो प्रत्येक पुरुष के लिये दो सेर दूध की खीर पुष्कल होती है, क्योंकि यह भी एक मध्य भाग की गिनती होती है। अर्थात् कोई भी 2 सेर दूध की खीर से अधिक खाये और कोई न्यून। इस हिसाब से एक प्रसूता गाय के दूध से एक हजार 980 मनुष्य एक बार तृप्त हो सकते हैं। गाय न्यून से न्यून आठ और अधिक से अधिक 18 बार ब्याती है, इसका मध्य भाग 13 बार आया तो 25740 मनुष्य एक गाय के जन्म भर के दूध मात्र के एक बार तृप्त हो सकते हैं। इस गाय की छ: पीढ़ी में छ: बछिया और सात बछड़े हुए इनमें से एक की मृत्यु रोगादि से होना संभव है तो भी बारह रहे। उन छह बछियों के दूध मात्र से उक्त प्रकार एक लाख चौवन हजार 440 मनुष्यों का पालन हो सकता है। अब रहे छ: बैल, उनमें से एक जोड़ी दोनों साख में 200 मन अन्न उत्पन्न कर सकती हैं। इस प्रकार तीन जोड़ी बैलों की 600 मन अन्न उत्पन्न कर सकती हैं और उनके कार्य का मध्य भाग आठ वर्ष है। इस हिसाब से 4800 मन अन्न उत्पन्न करने की शक्ति एक जन्म में तीनों की है। इतने (4800 मन) अन्न से प्रत्येक मनुष्य को 3 पाव अन्न भोजन मिले तो 2,56,000 मनुष्यों का एक बार का भोजन होता है। दूध और अन्न को मिलाकर देखने से निश्चय है कि 4,10,440 मनुष्यों का पालन एक बार के भोजन से होता है। अब छ: गाय की पीढ़ी-दर-पीढ़ियों का हिसाब लगाकर देखा जाये तो असंख्य मनुष्यों का पालन हो सकता है अर्थ व्यवस्था में गाय की भूमिका indian-currency हमारे ८०% लोग कृषि पर निर्भर है । इनमें से ९५% पशु आधारित खेती पर निर्भर हैं । बैलगाड़ियों द्वारा ढोया जाने वाले सामान रेलगाड़ियों से ४-५ गुणा अधिक होता है । इससे विदेशी मुद्रा की उल्लेखनीय बचत होती है । उदाहरणार्थ वर्ष २००५ में ५०,००० करोड़ रू. का परिवहन बैलगाड़ियों द्वारा हुआ । गो आधारित उद्योगों के विस्तार से हमारी अर्थ व्यवस्था में गाय की महत्वपूर्ण भूमिका हो जायेगी । यह दुःख का विषय है कि इसका पहले से ही महत्वपूर्ण स्थान हमारे लोग नहीं पहचानते ।

एक गाय, पांच एकड़ खेती

एक गाय, पांच एकड़ खेती

हींग लगे न फिटकरी, रंग चढ़े चोखा। शून्य लागत पर प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों के लिए यह कहावत सच साबित हो रही है। बिना रासायनिक खाद व कीटनाशक के प्रयोग के सिर्फ गोबर व गोमूत्र के प्रयोग से अनाज व सब्जी का अधिक उत्पादन मिलने लगा है। अपने पास अगर एक गाय है, तो पांच एकड़ तक खेती के लिए खाद की चिंता नहीं रहेगी। बस गोबर और गुड़ से ही फसल लहलहाएगी। गुणवत्तापूर्ण अधिक उत्पादन भी मिलेगा। पूर्ण प्राकृतिक खेती से फसल की कीमत भी अधिक मिलेगी। इस प्रकार से उगाई गई फसलों के सेवन से आप जहर खाने से बच जाएंगे। मिट्टी की उर्वरता भी बरकरार रहेगी। जीव-जंतु भी नष्ट नहीं होंगे। पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा और अपना स्वास्थ्य भी। धान की खेती के लिए तीन से चार बार गोबर, गोमूत्र, गुड़ व दाल के आटे का घोल छिड़काव कर बिना खाद के उपज ली जा सकती है। गेहूं, गन्ना, दलहन व सब्जी की खेती में भी यह प्रयोग उपयोगी है। एक ग्राम गोबर में 300-500 करोड़ सूक्ष्म जीवाणु : एक ग्राम गाय के गोबर में 300-500 करोड़ सूक्ष्म जीवाणु पाए जाते हैं। गाय के गोबर में गुड़ व अन्य पदार्थ डालकर किण्वन (फरमेंटेशन) से सूक्ष्म जीवाणु बढ़ाकर तैयार किया जीवामृत या घन जीवामृत जब खेत में पड़ता है, तो सूक्ष्म जीवाणु भूमि में उपलब्ध तत्वों से पौधों का भोजन निर्माण करते हैं। ऐसे करें प्रयोग बीजामृत बीज शोधन : 5 किलो गोबर, 5 लीटर गोमूत्र, 50 ग्राम चूना, एक मुट्ठी मिट्टी, 20 लीटर पानी में मिला कर 24 घंटे रखें। दिन में दो बार लकड़ी से घोलें। इसे 100 किलो बीजों पर उपचार करें। छांव में सूखा कर बोएं। जीवामृत : जीवामृत पौधों के लिए भोजन तैयार करते हैं। गोमूत्र 5 से 10 लीटर, गोबर 10 किलो, गुड़ एक से दो किलो, दलहन आटा एक से दो किलो, 100 ग्राम जीवाणु युक्त मिट्टी, 200 लीटर पानी मिलाकर ड्रम को जूट की बोरी से ढक कर छाया में रखें। सुबह-शाम डंडा से घड़ी की सूई की दिशा में घोलें। 48 घंटे बाद छान कर सात दिनों के अंदर प्रयोग करें। एक एकड़ में 200 लीटर जीवामृत पानी के साथ छिड़काव करना चाहिए। पहला छिड़काव बुआई के एक माह बाद एक एकड़ में 100 लीटर पानी 5 लीटर जीवामृत मिला कर। दूसरा 21 दिनों बाद एक एकड़ में 150 लीटर पानी व 10 लीटर जीवामृत मिला कर। तीसरा व चौथा छिड़काव 21-21 दिन बाद एक एकड़ में 200 लीटर पानी व 20 लीटर जीवामृत मिलाकर दें। आखिरी छिड़काव दाने की दूध की अवस्था में प्रति एकड़ में 200 लीटर पानी, 5-10 लीटर खट्टी छाछ मिला कर छिड़काव करना चाहिए। घन जीवामृत : गोबर 100 किलो, गुड़ एक किलो, दाल का आटा एक किलो, मिट्टी 100 ग्राम पांच लीटर गोमूत्र मिला कर 48 घंटे छाया में बोरी से ढककर रखें। इसके बाद छाया में ही फैलाकर सुखाएं। इसे छह माह तक प्रयोग कर सकते हैं। एक एकड़ में एक क्विंटल घन जीवामृत देना चाहिए। kisanhelp के संरक्षक श्री राधा कान्त जी कहते हैं कि किसान जितना भू भाग पर करता है प्रति एकड़ पर यदि वह २ गाय पालता है तो वह खुद खेती की लगत का 70% हिस्से दारी रखने वाली लगत खाद एवं कीटनाशक की लागत से बच जायेगा । गाय माता के पालन से वह किसान लगभग 20,000/- प्रति वर्ष लाभ कमा सकता है। श्री कान्त जी स्वम् 25 गाय का पालन करते हैं ।