भूदेवता एव गोरूपं धृत्वा स्वस्याः भारं निवर्तयितुं प्रार्थितवती खलु परीक्षिन्महाराजम्।यथा भूः पूज्या तथा गौरपि। गव एव धनमिति सत्यम्।धनस्य स्थाने पूर्वं भारते गोविनिमयः आसीत्।गां न रक्षामश्चेत् उपद्रवास्सम्भवन्त्येव। गोः अवमानेन दिलीपो नाम राजा कामधेनुना शप्त असीत्।सः वसिष्ठमहर्षेः उपदेशेन गोपूजां गोसेवां प्रतिदिनं वने उषित्वा पत्न्या सह कृतवान्।दिलीपः न सामान्यः। सः चक्रवर्ती। तथापि गोरवमानेन अतिकष्टमनुभूतवान्। गवि सर्वाः देवतास्सन्ति। गोधनमेव अपहृतं दुर्योधनेन। तत्फलितमप्यनुभूतवान्। अस्माकं देशोऽपि गोशापेनैव कष्टान् अनुभवति।सर्वदा सर्वधा गौः रक्षणीया।गोरक्ष्णं यज्ञाय आवश्यकम्।यज्ञेन पर्जन्यः तृप्यति।पर्जन्येन वृष्टिर्भवति।वृष्ट्या सस्यं वर्धते। सस्येन जीवाः जीवन्ति सम्यक्।देशोऽयं क्षोभरहितो भवति।एवं परम्परया गौः अस्मान् रक्षति।गोरक्षणं अस्माकं प्रथमो धर्मः।यदि अयं धर्मः रक्षितो भवति वयं रक्षिता भवामः।अत एवोक्तं विद्वद्भिः,”धर्मो रक्षति रक्षित” इति।
Monday, 6 February 2017
भारत समेत दुनिया भर में सबसे ज़्यादा मौतें हृदयाघात या हार्ट अटैक से होती हैं
भारत समेत दुनिया भर में सबसे ज़्यादा मौतें हृदयाघात या हार्ट अटैक से होती हैं। ऐसा माना जाता है कि अटैक से कुछ समय पहले ही इसके संकेत मिलना शुरू हो जाते हैं लेकिन लोग इन लक्षणों को आम समझ कर इन्हें नज़रअंदाज़ कर देते हैं जिसकी वजह से उनकी जान पे बन आती है। आइए जानते हैं कि कौन से हैं वो लक्षण जिनपर आपको हमेशा गौर करते रहना चाहिए।
दिल की अच्छी सेहत के लिए आपको हमेशा आपको सेहतमंद खानपान और व्यायाम पर ध्यान देना चाहिए। इसके अलावा आपकी नज़र अपनी सेहत पे भी बनी रहनी चाहिए। तकनीकी रूप से हार्ट अटैक तब आता है जब हार्ट का कोई हिस्सा ब्लॉक हो जाता है एवं हार्ट को ऑक्सीजनयुक्त रक्त नहीं मिल पाता। ऐसे में तुरंत इलाज न मिलने पर मरीज़ की मृत्यु भी हो सकती है।
हमारे दिल की सेहत में हुए बदलाव को जिस लक्षण के रूप में पहचाना जा सकता है वह है थकान। थकान से यहाँ अभिप्राय है कि बिना श्रम करे अथवा मामूली कार्य करने में भी यदि अक्सर थकान महसूस करते हैं तो यह एक चिंता का कारण हो सकता है। यदि अपने पर्याप्त मात्रा में भोजन किया हो तथा नींद भी भरपूर ली हो तब भी यदि आपको थकान महसूस हो तो यह सामान्य बात नहीं है।
दूसरा लक्षण है बेवजह नींद उचटना। यदि बार-बार आप नींद से जाग जाते हैं तो यह आपके अवचेतन का आपको जताने का एक तरीका है कि आपके शरीर के साथ कुछ ठीक नहीं है। ऐसे में बार-बार आपको लग सकता है कि आपको बाथरूम जाना है अथवा आपको बार-बार प्यास लगने के कारण उठना पड़ता है।
अन्य लक्षण जो कि हार्ट की किसी समस्या को इंगित करता है वह है हांफ भर आना। जब शरीर को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन नहीं मिल पति उस परिस्थिति में ऐसा होता है। इसके अलावा अक्सर आपको गहरी सांस लेने की भी आवश्यकता महसूस होती है।
सामान्य भोजन करने के पश्चात् भी यदि आपको अपच की शिकायत रहती है तो यह भी आपके दिल की सेहत से जुड़ा मामला हो सकता है।
यदि आप इन लक्षणों को महसूस कर रहे हैं तो आज ही आपको सजग हो जाना चाहिए। हमारी सेहत का ख्याल रखना हमारा परम कर्तव्य है। बिना समय गंवाए अपने दिल की जाँच कराएं और आवश्यक उपचार करें।
बीमारी नहीं ,फिर भी बीमार हैं तो ध्यान दीजिए
बीमारी नहीं ,फिर भी बीमार हैं तो ध्यान दीजिए
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कभी कभी हमारे सामने ऐसी भी समस्याएं आती हैं ,
जब व्यक्ति महसूस करता है कि वह बीमार है ,
किंतु मेडिकल जांच में कोई रोग ,
कोई समस्या नहीं निकलती ।
व्यक्ति सालों साल बीमार रहता है
पर न कोई दवा काम करती है न समझ आता है
कि उसे हुआ क्या है ।
डाक्टर कोई दिक्कत नहीं पाता ,व्यक्ति अस्वस्थ भी होता है ।
धीरे धीरे व्यक्ति घर -परिवार ,समाज से कटता जाता है ,चिड़चिड़ा हो जाता है ,कमजोर होता जाता है ,
दिनचर्या अव्यवस्थित हो जाती है ,
न नींद ठीक से आती है न भूख ठीक से लगती है ।
बुरे ख्याल ,बुरे सपने आते हैं ,हीन भावना ,निराशा घेरे रहती है और अंततः सचमुच रोगों का आक्रमण होने लगता है
क्योंकि प्रतिरोधक क्षमता समाप्त हो जाती है ।
ऐसी स्थिति का समाधान विज्ञान के पास नहीं होता ,
क्योकि भौतिक प्रमाणों पर आधुनिक विज्ञान आधारित होता है
और यहाँ भौतिक प्रमाण मिलते नहीं ।
यह समस्या नकारात्मक ऊर्जाओं से उतपन्न होती है ।
यह नकारात्मक ऊर्जा ग्रह दोष से उतपन्न हुई हो सकती है ।
पित्र दोष से उतपन्न हुई हो सकती है ।
वास्तु दोष ,सीलन आदि से उतपन्न हुई हो सकती है ।
पर्याप्त प्रकाश ,धुप न मिलने से हुई हो सकती है ।
देवी देवताओं की पूजा में हुई गलतियों से हो सकती है ।
कुलदेवी देवता की रुष्टता से उतपन्न हुई हो सकती है ।
किसी द्वारा टोना टोटका करने से हुई हो सकती है ।
अपने या अपने लोगों द्वारा बेहतरी के लिए किये गए कई उपाय ,
ये कुछ कारण ऐसी समस्या के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं ।
उपरोक्त कारण जरूरी नहीं की घर के सभी सदस्यों को प्रभावित करें ।
कोई कमजोर दिल का है उसे प्रभावित जल्दी कर देते हैं ।
किसी का ब्लड पतला हो उस पर प्रभाव जल्दी पड़ता है ।
कोई भावुक एकांत प्रिय अधिक हो उसे जल्दी प्रभावित करते है ।
कोई किसी परेशानी में चिंतित हो और आत्मबल कमजोर हो उसे प्रभावित करना शुरू कर सकते हैं ।
किसी को लक्ष्य कर कोई शक्ति या अभिचार भेज दिया जाए ,
कर दिया जाए तो ऐसा हो सकता है ।
ऐसे अनेक कारण होते हैं कि
घर का कोई एक ही व्यक्ति ऐसी समस्या से ग्रस्त हो सकता है ।
कभी कभी परिवार के कई लोग एक ही तरह की समस्या से ग्रस्त हो सकते हैं ।
कभी कभी रिश्तेदारी या खानदान में कई पीढ़ियों में एक सी समस्या दिख सकती है ।
ऐसी समस्याओं को सरसरी तौर पर नहीं देखना चाहिए ।
जब तक मूल कारण नहीं मिलता समस्या समाधान नहीं हो सकता ।
इसके लिए किसी उच्च जानकार की मदद लेनी चाहिए ।
यहाँ वहां के टोटके उपाय नहीं आजमाने चाहिए न लगातार उपाय बदलना चाहिए ।
मूल कारण पता करके बताए उपाय लगातार करने चाहिए
उपायों के अतिरिक्त कुछ क्रियाएं ,
सावधानियां व्यक्ति के स्वस्थ होने में मदद करती हैं ,
इन्हें करना चाहिए ।
जैसे व्यक्ति को पर्याप्त प्रकाश ,धुप आदि मिलना चाहिए ,
घर में सीलन ,अँधेरा आदि नहीं रखना चाहिए ।
व्यक्ति के मनोबल को बढ़ाना चाहिए ,उसे हमेशा आशावादी रखना चाहिए ।
एकांत से ,अकेलेपन से बचाना चाहिए ।
उसके प्रति व्यवहार सौहार्द्र पूर्ण रखना चाहिए ।
उसे घूमने फिरने ,खेलने कूदने ,लोगों से मिलने जुलने को कहना चाहिए ।
उसे व्यस्त रखना चाहिए ।
प्रेरक कथाएं ,जोश पूर्ण कहानियां पढ़ने को प्रेरित करनी चाहिए ।
इसके साथ योग्य ज्ञानी के बताए उपाय बिना तोड़ मरोड़ किये गम्भीरता से करने चाहिए ।.
स्त्रियां चूड़ियां क्यों पहनती हैं,
स्त्रियां चूड़ियां क्यों पहनती हैं, अधिकतर लोग नहीं जानते इसके खास कारण अधिकतर महिलाएं चूड़ियां या कंगन अवश्य पहनती हैं। आमतौर इस संबंध में यही मान्यता है कि चूड़ियां सुहाग की निशानी होती हैं और इसी कारण से पहनी जाती हैं।
चूड़ियों को पहनने के पीछे सुहाग की निशानी के अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण कारण भी हैं। आजकल अधिकांश महिलाएं चूड़ियां नहीं पहनती हैं। इस कारण कई महिलाओं को कमजोरी और शारीरिक शक्ति का अभाव महसूस होता है। जल्दी थकान हो जाती है और कम उम्र में ही गंभीर बीमारियां घेर लेती हैं। जबकि, पुराने समय में महिलाओं के साथ ऐसी समस्याएं नहीं होती थीं। उनका खानपान और नियम-संयम भी उनके स्वास्थ्य को अच्छा बनाए रखता था। चूड़ियों के कारण स्त्रियों को ऐसी कई समस्याओं
से मुक्ति मिल जाती है।
शारीरिक रूप से महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक नाजुक होती हैं।चूड़ियां पहनने से
स्त्रियों को शारीरिक रूप से शक्ति प्राप्त होती है। पुराने समय में स्त्रियां सोने या चांदी की चूड़ियां ही पहनती थी। सोना और चांदी लगातार शरीर के संपर्क में रहता है, जिससे इन धातुओं के गुण शरीर को मिलते रहते हैं। महिलाओं को शक्ति प्रदान करने में सोने-चांदी के आभूषण भी मुख्य भूमिका अदा करते हैं। हाथों की हड्डियों को मजबूत बनाने में सोने-चांदी की चूड़ियां श्रेष्ठ काम करती हैं।
आयुर्वेद के अनुसार भी सोने-चांदी की भस्म शरीर को बल प्रदान करती है। सोने-चांदी के घर्षण से शरीर को इनके शक्तिशाली तत्व प्राप्त होते हैं, जिससे महिलाओं को स्वास्थ्य लाभ मिलता है। इस कारण अधिक उम्र तक वे स्वस्थ रह सकती हैं। चूड़ियों के संबंध में धार्मिक मान्यता यह है कि जो विवाहित महिलाएं चूड़ियां पहनती हैं, उनके पति की उम्र लंबी होती है। आमतौर पर ये बात सभी लोग जानते हैं। इसी वजह से चूड़ियां विवाहित स्त्रियों के लिए अनिवार्य की गई है।
किसी भी स्त्री का श्रृंगार चूड़ियों के बिना पूर्ण नहीं हो सकता। चूड़ियां स्त्रियों के 16 श्रृंगारों में से एक है। जिस घर में चूड़ियों की आवाज आती रहती हैं, वहां के वातावरण में
नकारात्मक ऊर्जा नहीं रहती है।
चूड़ियों की आवाज भी सकारात्मक वातावरण निर्मित करती है। जिस प्रकार मंदिर की घंटी की आवाज वातावरण को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती है, ठीक उसी प्रकार चूड़ियों की मधुर ध्वनि भी वही कार्य करती है।
जिस घर में महिलाओं की चूड़ियों की आवाज आती रहती है, वहां देवी-देवताओं की भी विशेष कृपा बनी रहती है। ऐसे घरों में बरकत रहती है और वहां सुख-समृद्धि का वास होता है।
साथ ही, यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि स्त्री को अपना आचरण भी पूर्णतया धार्मिक रखना चाहिए। केवल चूड़ियां पहनने से ही सकारात्मक फल प्राप्त नहीं होता है।
सारी सृष्टि में केवल दो ही प्राणियों के देह ऐसे हैं जिनमे पूरे तैंतीस कोटी प्राण निवास करते हैं- गाय और मानव ।
सारी सृष्टि में केवल दो ही प्राणियों के देह ऐसे हैं जिनमे पूरे तैंतीस कोटी प्राण निवास करते हैं- गाय और मानव ।
सारी सृष्टि में केवल दो ही प्राणियों के देह ऐसे हैं जिनमे पूरे तैंतीस कोटी प्राण निवास करते हैं- गाय और मानव । मानव को कर्म स्वातंत्र्य होने के कारण वह उन प्राणों का साक्षात्कार कर अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिये उनका प्रयोग कर सकता है । इसी के लिये गोमाता का पूजन व सान्निध्य अत्यन्त उपयोगी है । इस विज्ञान के कारण ही गाय को समस्त देवताओं के निवास के रूप में पूजा जाता है । सभी धार्मिक अनुष्ठानों में गाय के पंचगव्यों का महत्व होता है । गोबर से लिपी भूमि, दूध, दही, घी से बना प्रसाद, गोमूत्र का सिंचन तथा गोमाता का पूजन पूरे तैंतीस करोड प्राणों को जागृत कर पूजास्थल को मानव के सर्वोच्च आध्यात्मिक उत्थान की प्रयोगशाला बना देता है । गायों की प्रचूरता के कारण ही भारतभूमि यज्ञभूमि बनी है । आज हमने गायों को दुर्लक्षित कर दिया है इसी कारण देश के प्राणों पर बन पडी है । गाय के सान्निध्य मात्र से ही मनुष्य प्राणवान बन जाता है । आज हमारे शहरी जीवन से हमने गाय को कोसों दूर कर दिया है । परिणाम स्पष्ट है मानवता त्राही-त्राही कर रही है और दानवता सर्वत्र हावी है । आज मानव के स्वयं के कल्याण हेतु, विश्व की रक्षा हेतु, पर्यावरण के बचाव के लिये तथा समग्र, अक्षय विकास के लिये गाय के संवर्धन की नितान्त आवश्यकता है । गो-विज्ञान को पुन: जागृत कर जन -जन में प्रचारित करने की अनिवार्यता है । गोचर भूमि के संरक्षण के माध्यम से कटती गायों को बचाने के उपक्रम तो आपात्कालीन उपाय के रूप में करने ही होंगे किन्तु गो आधारित संस्कृति के विकास के लिये गो-केन्द्रित जीवन पद्धति को विकसित करना होगा । प्रत्येक घर में गाय का पालन करने के लिए प्रोत्साहित करना आवश्यक है । गाय के सान्निध्य मात्र से ही जीवन शरीर, मन, बुद्धि के साथ ही आध्यात्मिक स्तर पर पवित्र व शुद्ध हो जायेगा । प्रतिदिन कटती लाखों गायों के अभिशाप से बचने के लिये शासन पर दबाव डालकर गो-हत्या बंदी करवाने का प्रयास तो आवश्यक है ही किन्तु उससे भी बडी आवश्यकता है प्रत्येक के दैनंदिन जीवन में गाय प्रमुख अंग हो । घर घर में गोपालन हो । अपने हाथ से गोसेवा करने का सौभाग्य हर परिवार को प्राप्त हो । प्रत्यक्ष जिनके भाग्य में यह गोसेवा नहीं वे रोज गोमाता का दर्शन तो करें । मन ही मन पूजन, प्रार्थना करें व प्रतिदिन अपनी आय का कुछ भाग इस हेतु दान करें । किसी ना किसी रूप में गाय हमारे प्रतिदिन के चिंतन, मनन व कार्य का हिस्सा बनें । यही मानवता की रक्षा का एकमात्र उपाय है ।
Friday, 3 February 2017
गाय को “गोधन” कहा जाता रहा है
गाय को “गोधन” कहा जाता रहा है
भारतीय विज्ञान की दिशा अंदर से बाहर की ओर है । आधुनिक विज्ञान बाह्य घटनाओं के निरीक्षण व प्रयोग के द्वारा उसमें छिपे सत्य को पहचानने का प्रयत्न करता है । हिन्दू विज्ञान सूक्ष्म से स्थूल की ओर ले जाता है तो आधुनिक विज्ञान ठोस स्थूल के माध्यम से विश्लेषण व निष्कर्ष की विधि द्वारा सूक्ष्म को पकडने का प्रयास कर रहा है । इस मूलभूत भेद को समझने से हम भारतीय वैज्ञानिक दृष्टि का सही विकास कर सकते हैं । फिर हम अपने अज्ञान के कारण ॠषियों द्वारा स्थापित परम्पराओं को अन्धविश्वास के रूप में नकारने के स्थान पर उनमें छिपे गूढ तत्व को समझने का प्रयत्न करेंगे । गाय को भारतीय जीवन में दिये जाने वाले महत्व को भी इसी श्रद्धात्मिका दृष्टि से समझा जा सकता है । निश्चित ही कृषिप्रधान राष्ट्र की अर्थव्यवस्था का केन्द्रबिन्दू होने के नाते गाय को “गोधन” कहा जाता रहा है । वैदिक काल में इसके वास्तविक धन के रूप में प्रचलित होने की भी सम्भावना है । किसी चलन के समान सम्पदा के मापन का एक आधार गायों की संख्या रहा है । जिसके पास अधिक गायें होंगी वह अधिक सम्पन्न माना जाता रहा है । ऊर्जा एवं उत्पादकता के रूप में पूर्ण उपयोगिता इस आर्थिक महत्व का एक कारण निश्चित ही रहा होगा । गाय द्वारा प्रदत्त दूध, दही, माखन व घी जैसे पौष्टिक उत्पादों, यांत्रिक ऊर्जा के रूप में गोवंश की उपयोगिता के साथ ही गाय के विसर्जन, गोबर व गोमुत्र भी कृषि कार्य में खाद व कीटनाशक के रूप में अत्यन्त उपयोगी होते हैं । गोबर आज भी ग्राम्य भारत में ईंधन का सबसे पवित्र स्रोत है । इस प्रकार गाय अपने पूरे जीवन पर्यन्त मानव के उपयोगी रहने के बाद मृत्यु के पश्चात भी गोचर्म के द्वारा पदवेश, कवच आदि विभिन्न उत्पादों से मानव की रक्षा का कार्य करती है । गाय की इस सर्वांगीण उपयोगिता से ही उसे गोधन माना जाता है ।
गायों की प्रचूरता के कारण ही भारतभूमि यज्ञभूमि बनी है
गायों की प्रचूरता के कारण ही भारतभूमि यज्ञभूमि बनी है
गायों की प्रचूरता के कारण ही भारतभूमि यज्ञभूमि बनी है । पर आज हमने गायों को दुर्लक्षित कर दिया है इसी कारण देश के प्राणों पर बन पडी है । गाय के सान्निध्य मात्र से ही मनुष्य प्राणवान बन जाता है । आज हमारे शहरी जीवन से हमने गाय को कोसों दूर कर दिया है । परिणाम स्पष्ट है मानवता त्राही-त्राही कर रही है और दानवता सर्वत्र हावी है । तपोभूमि भारत ॠषियों की भूमि है । तपस्या के द्वारा यहाँ ज्ञान व विज्ञान दोनों का ही परमोच्च विकास हुआ । अपने गहन अंतरतम में प्रसुप्त सत्य को प्रकाशित करना ज्ञानयज्ञ है । वहीं सत्य जब जीवन के व्यवहार में उतारा जाता है तब ज्ञान के इस विशेष प्रयोग को विज्ञान कहते हैं । हिन्दू जीवन पद्धति के हर अंग की वैज्ञानिकता का यही रहस्य है । आधुनिक भौतिक विज्ञान की प्रगति के साथ जहाँ अन्य मतों को अपने धर्मग्रंथों को बदलना पड रहा है, वहीं दूसरी ओर जैसे-जैसे अणु से भी सूक्ष्म कणों पर प्रयोग के द्वारा सृष्टि के सुक्ष्मतम रहस्यों की खोज होती जा रही है वैसे-वैसे वेदोक्त हिन्दू सिद्धान्तों की पुष्टि होती जा रही है । बीकानेर के लालेश्वर महादेव मंदिर के महंत संवित सोमगिरीजी महाराज को रक्षा अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक ने सूचना दी कि आधुनिक भौतिक विज्ञान की खोजें वेदान्त के सिद्धान्तों को साबित कर रही है तो स्वामीजी ने अनायास कहा, ‘‘इसका अर्थ है अब भौतिक विज्ञान सही दिशा में आगे ब‹ढ रहा है । वेद तो सत्य है ही उनके निकट आने से आधुनिक विज्ञान की सत्यता स्पष्ट होती है । यदि हमारे ॠषियों की बातें आज हमें वैज्ञानिक आधार पर स्पष्ट नहीं हो पा रही है तो शंका उनकी सत्यता पर नहीं विज्ञान के अधूरेपन पर करनी होगी ।”